कानून के तराजू पर निजी और सरकारी स्कूल...
मध्यप्रदेश के इंदौर शहर से स्थानीय अखबारों में यह खबर सुर्खियों में है कि समान व नि:शुल्क शिक्षा अधिनियम के 1 अप्रैल से लागू होने के बाद अब तक कागजों पर दिखाए जाने वाला प्रवेश अब शासन द्वारा करवाया जाएगा, जिससे ये स्कूल आर्थिक रूप से कमजोर 25 प्रतिशत बच्चों को प्रवेश से रोक नहीं सकेंगे।
खबरों के मुताबिक शहर में कई शासकीय अनुदान प्राप्त संस्थान सालों से चल रहे हैं। ये न केवल संस्थान के लिए जमीन लेने के नाम पर बल्कि प्रत्यक्ष अनुदान के रूप में शासन से लाखों रुपए हर साल लेते रहे हैं। कहा गया है कि अब तक ऐसे कई संस्थान न तो शासन को नि:शुल्क प्रवेश वाले छात्रों की संख्या बताते थे, न ही अन्य नियमों का पालन करते थे लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। शिक्षा विभाग इसकी मॉनीटरिंग करेगा और प्रशासन का भी इसमें सीधा हस्तक्षेप रहेगा। यह माना जा रहा है कि इसका सीधा फायदा कमजोर व मध्यम वर्ग के बच्चों को होगा।
शालेय शिक्षा के क्षेत्र में यह पहल अच्छी नजर आती है जिससे कमजोर तबके के छात्रों को लाभ होगा. लेकिन इसके साथ ही राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन को यह भी देखना चाहिए कि शिक्षा से संबंधित ऐसे कई मामले हैं जिनमें कानून के पालन की जिम्मेदारी सरकारी स्कूलों के कर्ताधर्ताओं की भी है.
निजी स्कूलों को कानून का पालन जरूर करना चाहिए लेकिन क्या सिर्फ इन निजी स्कूलों को कानून का डंडा दिखा कर सरकार शिक्षा का मौजूदा परिदृश्य बदल सकती है. प्रदेश की सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का क्या हाल है यह भी देखना जरूरी है. मध्य प्रदेश में सरकारी शालेय शिक्षा का अच्छा खासा नेटवर्क है. यदि सरकार अपने ही महकमे को भी दुरुस्त रखेगी तो प्रदेश का कल्याण हो जाएगा. सरकारी स्कूलों में बुनियादी ढांचे का अभाव, शिक्षा प्रदान करने के उचित मानकों के पालन का अभाव और शिक्षकों का गायब रहना सबसे बड़ी समस्याएं हैं.
लोग सरकारी स्कूल की बजाए निजी स्कूल में ज्यादा पैसे देकर बच्चों को इसलिए भी पढ़ाते हैं क्योकि देश के कई हिस्सों में अब “सरकारी” स्कूलों को बुनियादी शिक्षा का बहुत अच्छा केंद्र नहीं माना जाता. सरकारी स्कूलों की दशा सुधारना इस समय ज्यादा जरूरी है.
कानून का डंडा दिखा कर स्कूलों के प्रबंधन के साथ सख्ती बरतना गलत नहीं है लेकिन सरकारी तंत्र के अंतर्गत आने वाले स्कूलों में बुनियादी सुधारों की दरकार को अनदेखा नहीं किया जा सकता. भारत में यह बात साबित हो चुकी है कि स्कूली शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे को अब “निजी” या “सरकारी” खेमों में बांट कर पूर्वाग्रह के आधार पर नहीं देखा जा सकता.
- देश के शिक्षा तंत्र में आप निजी और सरकारी स्कूलों की भूमिका को किस तरह देखते हैं?
- आपकी नजर में सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता को कैसे सुधारा जा सकता है?
- क्या आपको लगता है कि आपसी प्रतिस्पर्धा के कारण निजी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधर रही है?
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