सरकार के नहीं, खुद के भरोसे...

अगर इरादे बुलंद हैं तो आप अपनी जिंदगी बदल सकते हैं. ऐसा ही कुछ गुड़गांव के निकट स्थित ताजनगर गांव के लोगों की जिजीविषा के बारे में भी कहा जा सकता है। जिन्होंने लगभग तीन दशक पहले पैदा हुई इच्छा को आज पूरा कर दिखाया है। ताजनगर रेलवे स्टेशन (रेलवे अधिकारी इसे हॉल्ट कह रहे हैं) को यहां के स्थानीय लोगों ने सरकारी मदद के बिना अपने दम पर खड़ा किया है। सरकार से स्टेशन निर्माण की आस लगाए बैठे लोगों के धैर्य ने दो साल पहले जब जवाब दे दिया तो उन्होंने स्टेशन निर्माण का बीड़ा खुद उठाया। बस, फिर क्या था एक 11 सदस्यीय समिति का गठन किया गया और उसने लोगों से चंदा लेना शुरू किया। चंदे में कम से कम 3,000 रु. लिए गए जबकि कई लोगों ने और भी ज्यादा राशि चंदे के रूप में दी।

लेकिन प्रश्न यह था कि अगर रेलवे स्टेशन बना भी लिया जाता है, तो रेलगाड़ियां यहां रुके इसके लिए क्या किया जाए? इस पर पंचायत ने रेलवे से पूछा कि अगर गांव के लोग रेलवे स्टेशन बना लेते हैं तो क्या वह यहां रेलगाड़ियां रोकेंगे? रेलवे ने इस पर रजामंदी जताई तो जनवरी 2008 में निर्माण कार्य शुरू हो गया। लगभग 21 लाख रु की लागत से बने इस स्टेशन का उद्घाटन 5 जनवरी 2010 को किया गया। अब यहां रेवाड़ी से दिल्ली और दिल्ली से रेवाड़ी जाने वाली सात इएमयू और पैसेंजर गाड़ियां रुकती हैं।

अब स्टेशन पर पटरी के दोनों और प्लेटफॉर्म हैं, हालांकि प्लेटफॉर्म कच्चे हैं। प्लेटफॉर्म में टिकट का काम ठेके पर है, और रेलवे का कहना है कि अगर अच्छी संभावनाएं नजर आती हैं, तो इसे और विकसित भी किया जा सकता है।

अगर एक समाज कुछ करने की ठान लेता है, तो वह बहुत कुछ कर सकता है, और उसे हर काम के लिए सरकार का मुंह ताकने की भी जरुरत नहीं। भारत के अब भी कई राज्य ऐसे हैं, जहां लोग गाड़ी रोकने के लिए चेन खींचते हैं या अन्य गैरकानूनी उपायों का सहारा लेते हैं, अगर इस तरह के राज्यों के लोग भी ताजनगर के वासियों से कुछ सबक लें तो उन्हें अगली गाड़ी को रोकने के लिए किसी गैरकानूनी सहारे की जरुरत नहीं पड़ेगी।

  • क्या सरकार को जनता की मदद से विकास का लक्ष्य हासिल करने के लिए इसी तरह जनता और निजी क्षेत्र की मदद लेनी चाहिए?
  • आपकी नजर में ऐसे कौन-कौन से काम हैं जो आप सरकार की बजाए खुद करना चाहेंगे?
  • क्या आपको लगता है नागरिकों की ऐसी पहल अनुकरणीय है?