ग्लोबल वार्मिंगः जलवायु का विज्ञान - एमेन्युअल मार्टिन
अब जबकि क्लाइमेट गेट ने जलवायु परिवर्तन के मूल को लेकर चर्चा में तेजी ला दी है। यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि आखिर विज्ञान क्या है? यहां कोपेनहेगन में मौजूद नीति निर्धारकों के लिए कुछ विचार पेश हैं।
विज्ञान आलोचना के जरिए ज्ञान हासिल करने की एक प्रक्रिया है। सिद्धांत पेश किए जाते हैं और उनको परखा जाता है और जिनमें खामियां होती हैं, उनको या तो खारिज कर दिया जाता है या फिर उनका नए सिरे से अध्ययन किया जाता है। इस तरह से विज्ञान परीक्षण-गलती-सुधार की प्रक्रिया से होते हुए प्रगति करता है। बात किसी भी वक्त की हो, विज्ञान में बहस की दो श्रेणियां होती हैं। पहली वो जिसे पर्याप्त आधार के साथ स्थापित किया गया हो और जिस पर कोई विवाद न हो (उदाहरण के लिए, यह दावा कि धरती सपाट नहीं है)। दूसरी वह होती है जिसमें कुछ मसलों पर विवाद कायम हो और जिनको अभी और परीक्षण की दरकार हो।
जहां तक ग्लोबल वार्मिंग की बात है, यह दूसरी केटेगरी में आता हैः जलवायु विज्ञान एक जटिल क्षेत्र है और हर बार जलवायु के सभी निर्धारकों के सही अनुमान की अपेक्षा इससे नहीं की जानी चाहिए (उदाहरण के लिए बादल)। सम्मानित वैज्ञानिकों के बीच इसी तरह की एक बहस ग्लोबल वार्मिंग के कारणों को लेकर भी होती है। इनमें से कम संख्या वालों की राय सूरज और समुद्रों की भूमिका पर (कार्बन डायआक्साइड की बजाय) आधारित होती है जबकि बहुसंख्यकों की राय में ग्लोबल वार्मिंग के लिए पूरी तरह से इंसान ही जिम्मेदार है। यहां वैज्ञानिकों के विचारों में सहमति एक समस्या है। क्या यह "सच" है कि जलवायु में हो रहे परिवर्तन के लिए इंसान ही जिम्मेदार है? इस तरह की स्थिति में सच का फैसला सबूतों या फिर सिद्घांतों के परीक्षण के जरिए नहीं होगा बल्कि इस आधार पर होगा कि बहुसंख्य वैज्ञानिक क्या सोचते हैं? 50 के दशक में इस बात को लेकर सहमति थी कि महाद्वीप धीरे-धीरे अलग नहीं हो रहे हैं। बीस साल बाद नये सबूतों के कारण पूरी परिस्थिति ही बदल गई। उस गलत सहमति के लिए प्रयोगों में गलती के साथ-साथ कमजोर आंकड़ों और माडल्स को भी दोषी ठहराया जा सकता है। यहां समाज विज्ञान के शब्दों को इस्तेमाल किया जा सकता हैः नेटवर्क का प्रभाव, शिक्षा के जरिये इस तरह के वैज्ञानिकों को तैयार किया जाना जो कम संख्या में मौजूद विचारों से पूरी तरह से अनजान थे, आर्थिक मदद करने वाले लोगों के हित। इसने विज्ञान की महत्वपूर्ण प्रक्रिया को कमजोर किया और "वैज्ञानिक सहमति" को भी जरूरत से कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर दिया।
जलवायु विज्ञान एक ताजा क्षेत्र है, पूरी तरह से विकसित होने से काफी परे। और इसके भीतर जलवायु परिवर्तन के कारणों को लेकर बहस पूरे शबाब पर है। एसे में यह कहना अनुचित और गैर वैज्ञानिक ही होगा कि कारणों को लेकर स्थिति पूरी तरह से स्पष्ट हो चुकी है। जाहिर तौर पर यह स्पष्ट नहीं है। फिर भी इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) के कुछ वैज्ञानिक ठीक यही दावा कर रहे हैं-आईपीपीसी के सह निदेशक थामस स्टाकर ने ले मोंड में विरोध करने वालों को नकारात्मक तक की संज्ञा दे डाली थी। रेमंड पियरहम्बर्ट के लिए मान (Mann) के कथित "हाकी-स्टिक कर्व" (तापमान इसी स्तर पर रहा करता था लेकिन 20वीं सदी के अंत तक इसमें तेजी से बदलाव आया) को शंका की नजर से देखने वाले धरती के सपाट होने की बात करने वालों के ही युग से ताल्लुक रखते थे। इन शंकालुओं की तुलना धार्मिक उन्मादियों से की गई। क्या विरोधाभास हैः जबकि विज्ञान में हर एक बात को लेकर शंका को ही एक अच्छा गुण माना जाता है, खासतौर पर नई और जटिल शाखाओं में, यही अब हठधर्मिता का आधिकारिक लक्षण मान लिया गया है। इससे भी गंभीर बातें हैं। ग्लोबल वार्मिंग के लिए इंसान को ही दोषी मानने वाले वैज्ञानिकों के बीच ईमेल का ताजा आदान-प्रदान एक वैज्ञानिक के तौर पर दुर्व्यवहार का उदाहरण पेश कर रहा है। जैसे-आंकड़ों से खिलवाड़, आंकड़ों को अपने फायदे के लिए तोड़ना-मरोड़ना, लोगों पर दबाव बनाना और विरोधाभासी लेखों के प्रकाशन से मामले को और अधिक उलझा देना। जलवायु विज्ञान यूनिट के डायरेक्टर फिल जोंस ने अस्थायी तौर पर इस्तीफा दिया था। "हाकी-स्टिक कर्व" के लेखक माइकल मान भी इस घोटाले में उलझे हुए हैं, क्योंकि ऐसा लगता है कि उन्हें मध्यकालीन वार्मिंग पीरियड अच्छा नहीं लगा क्योंकि इससे सारा दोष ताजा हालातों पर मढ़ने का मौका ही मानो हाथ से चला गया। और यही वह वैज्ञानिक हैं जिनके आंकड़ों के आधार पर सारी दुनिया के वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन का सारा हिसाब लगाते हैं।
अंत में आईपीसीसी का सिद्धांत कहता है कि इंसान द्वारा उत्सर्जित कार्बन डायआक्साइड ही ग्रीनहाउस प्रभाव के कारण ग्लोबल वार्मिंग का कारण बनती है। कार्बन डायआक्साइड की मात्रा में निश्चित ही पिछली एक सदी में इजाफा हुआ है। धरती के तापमान में 0.74 फीसदी का इजाफा हुआ है। क्या यह चिंताजनक है? पहले, बर्फ की परतों के अध्ययन से यह बात पता चलती है कि सैकड़ों-हजारों साल से तापमान पहले बढ़ता है और फिर कार्बन डायआक्साइड, उलटा नहीं। शायद संकट की स्थिति को थ्रेशहोल्ड इफेक्ट के कारण टाला जा सकता है। लेकिन फिर कार्बन डायआक्साइड उत्सर्जन में इतने इजाफे के बाद भी पिछले एक दशक में तापमान इतना स्थिर है? पिछला एक दशक आईपीसीसी की थ्योरी को फिलहाल तो नाकाम साबित कर देता है।
इस तरह आज हम, आईपीसीसी के वैज्ञानिकों का दुर्व्यवहार (जो तमाम आंकड़ों को भी नियंत्रित करते हैं) और आईपीसीसी की उस थ्योरी के साथ जो साबित नहीं हो सकी है, एक ऐसी वास्तविक वैज्ञानिक बहस में उलझ गए हैं जिसे कुछ वैज्ञानिक और राजनीतिज्ञ तो समाप्त करार दे रहे हैं जबकि ऐसा है नहीं। पिछले एक दशक से तापमान भी नहीं बढ़ रहा। बेहतर और सावधानी भरा कदम यही होगा कि हम इस समूचे घटनाक्रम पर गंभीरता के साथ सोचने के लिए कुछ वक्त लें और इस दौरान किसी बेहद खर्चीले राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय अभियान से पहले वैज्ञानिकों की बहस को जारी रहने दें। क्योंकि ये हमारी वर्तमान, वास्तविक समस्याओं पर अनिवार्य खर्च से ही संसाधनों का दोहन कर रहे हैं।
- एमेन्युएल मार्टिन, संपादक www.UnMondeLibre.org
