मुफ्त बिजली, मुफ्त नहीं है
सबसे होशियार राजनीतिज्ञों में भी दूरगामी परिणामों को सोचने की ताकत का अभाव मुझे चौंका देता है। अनेक मुख्यमंत्रियों ने चुनावी परिणामों से यह निष्कर्ष निकाल लिया है कि यह मतदाता की मुफ्त बिजली की मांग से प्रभावित थे। आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु ने तो किसानों के लिए अपनी बिजली दरें सिफर कर दी हैं तो महाराष्ट्र ने इसे 50 पैसे से घटाकर 25 पैसे कर दिया है।
निंदक इस बात की ओर ध्यान दिलाएंगे कि चुनावों में पॉपुलर वोट में एक फीसदी का बदलाव, हार या जीत को तय कर देता है। इसलिए राजनीतिज्ञ उस एक फीसदी वोट के साथ चुनाव भी गंवाने का जोखिम मोल नहीं लेना चाहते। इसलिए आबादी के हर तबके के लिए अनुदानों में जमकर इजाफा किया जाता है, तब तक जब तक कि खजाना खाली न हो जाए।
राजनीतिज्ञ जानते हैं कि यह दूरगामी सोच वाला कदम नहीं है और इसका लाभ भी स्थायी नहीं है। लेकिन तर्क यह है कि जब वोटर में इतना दृष्टिदोष है कि वह अनुदानों को स्थायी विकास पर तरजीह दे सकता है तो फिर राजनीतिज्ञों को भी बातों को इसी नजर से देखना चाहिए। वे तो केवल जनता की मांगों के मुताबिक काम कर रहे हैं, जैसा कि लोकतंत्र में होता है। गलत।
सभी लोकतंत्रों में लोकप्रिय और कंगाल सरकारें नहीं होतीं। निश्चित ही लोग तो यही चाहेंगे कि उनको कुछ देने की बजाय लगभग हर चीज मुफ्त मिल जाए। लेकिन राजनीतिज्ञों (और मीडिया) को लोगों को यह बात समझानी चाहिए कि बिजली आसमान से गिरने वाली बारिश की तरह मुफ्त नहीं बरसती। इसके उत्पादन, ट्रांसमिशन और वितरण में काफी खर्च आता है।
अगर किसान इसका भुगतान नहीं करता, तो इसे आपके और मेरे जैसे करदाताओं से वसूला जाता है। आज कंगाल हो चुकी राज्य सरकारें न तो सड़कों का उचित रखरखाव कर पाती हैं, न स्कूलों को पाठ्यपुस्तक उपलब्ध करा सकती हैं और न ही अस्पतालों में दवाएं। ग्रामीण विकास भी उसके बूते के बाहर है। किसानों को मुफ्त में बिजली देने का मतलब है कि राज्य सरकार के पास पैसे की और कमी।
इसका मतलब है कम स्कूल, कम दवा, कम सड़क और कम रोजगार। इसलिए किसानो को मुफ्त में दी जाने वाली बिजली दरअसल मुफ्त नहीं है। इसकी कीमत हम ज्यादा निरक्षरता, खराब स्वास्थ्य सेवाओं, बेरोजगारी, दूरगामी इलाकों के लोगों के लिए सड़कों के अभाव से चुकाते हैं। मुफ्त बिजली एक कैंसर की तरह है, यह फैलती है तो अपने साथ कई अन्य बीमारियां भी ले आती है। एक-एक करके इन्हें देखें।
पहली, क्योंकि बिजली मुफ्त में मिल रही है इसलिए किसान अपने पंप सेटों को स्विच ऑफ करने तक की जहमत नहीं उठाते। ऐसे में वे उस बिजली को भी इस्तेमाल कर लेते हैं, जिसकी उनको नहीं लेकिन दूसरों को जरूरत है।
दूसरी बात, कई किसानों के पास बाबा आदम के जमाने के पंप सेट हैं जो जरूरत से ज्यादा बिजली खाते हैं, लेकिन उनकी जगह बिजली की बचत करने वाले नए पंप सेट नहीं लगाए जाते। अगर बिजली की सही कीमत रखी जाए तो किसान भी बिजली बर्बाद करने वाले पंपों की बजाय बिजली बचाने वाले उपकरण लगाने के लिए प्रोत्साहित होंगे।
तीसरा, मुफ्त बिजली के कारण ऐसी फसलों को प्रोत्साहन मिल रहा है जो ज्यादा पानी की खपत करती हैं, इसका हमारे पर्यावरण पर भी नकारात्मक असर पड़ता है। पंजाब और हरियाणा जैसे कम बारिश वाले इलाकों को तो चावल जैसी ज्यादा पानी मांगने वाली फसल उगाने ही नहीं चाहिए।
इन राज्यों को तुरंत मक्के जैसी कम पानी का इस्तेमाल करने वाली खरीफ फसलों की ओर लौट जाना चाहिए। लेकिन, जब तक पानी मुफ्त है किसान चावल की फसल को ही प्राथमिकता देंगे। चावल की ऊंची कीमत ही यह बता देती है कि इसके लिए कितना ज्यादा पानी खर्च किया गया है। फिर भी इसका असर किसान नहीं केवल पर्यावरण पर ही दिखाई देगा।
वास्तविकता में, किसान को पर्यावरण को बरबाद करने के लिए अनुदान दिया जा रहा है। न केवल पंजाब और हरियाणा बल्कि कम बारिश वाले महाराष्ट्र जैसे राज्य में भी पानी का बहुत ज्यादा इस्तेमाल करने वाली गन्ने की फसल का उत्पादन किया जाता है। जबकि ऐसी फसलें तो केवल उन इलाकों में ही पैदा की जानी चाहिए जहां जोरदार बारिश होती हो।
चौथा, मुफ्त बिजली के कारण गरीबों को पेयजल और छोटे किसानों को सिंचाई के पानी के लिए तरसना पड़ता है। जब पंप के ज्यादा इस्तेमाल के कारण जमीन के भीतर जलस्तर गिरता है तो छोटे किसानों के छोटे-छोटे से खेतों को पानी की आपूर्ति करने वाले कुएं भी सूखते जाते हैं। यानी कि ऐसे लाखों लोग जिनको ऐसा पानी उपलब्ध था अब इस सुविधा से भी वंचित कर दिए गए हैं।
पांचवां, जलस्तर जब और गिरता है तो उस इलाके के ट्यूबवेल भी सूख जाते हैं। इसलिए मझोले किसान भी प्रभावित होते हैं। अंततः ऐसे बेहद गहरे ट्यूबवेल, जो अमीर किसानों के बूते की बात होते हैं, ही ऐसे होते हैं जहां से पानी का इस्तेमाल किया जा सकता है।
वर्ल्ड बैंक के आंध्र प्रदेश के अनुदान पर किए गए एक ताजा अध्ययन के अनुसार जहां बड़े किसानों को कुल मिलाकर सालाना 50 हजार रुपए तक का अनुदान मिला, वहीं छोटे किसानों को यह अनुदान सालाना 8 हजार रुपए का ही रहा। और हां, भूमिहीन श्रमिकों के खाते में तो कुछ भी नहीं आया।
छठा, रीते पड़ रहे ट्यूबवेलों में सस्ते सेंट्रीफ्यूगल पंप, जो छोटे किसानों की पहुंच में होते हैं, लगाए जाते हैं। लेकिन ऐसे पंप तीस फीट से ज्यादा गहराई से पानी को ऊपर नहीं ला सकते। इसलिए जब जलस्तर और अधिक गिरता है तो लाखों सेंट्रीफ्यूगल पंप बेकार हो जाते हैं। उनकी जगह ज्यादा महंगे सबमर्सिबल पंपों की जरूरत पड़ती है। यह वर्तमान में इस्तेमाल किए जा रहे उपकरणों की बर्बादी तो है ही नए सबमर्सिबल पंपों में ज्यादा पैसे खर्च किए जाने का कारण भी बनता है।
बुराइयों का असर लंबा और काफी क्रूर होता है। मुफ्त बिजली मुफ्त नहीं है। गरीब, अनपढ़ और बीमार इसकी कीमत चुकाते हैं। पर्यावरण के नुकसान से भी इसकी कीमत चुकाई जाती है। लोगों को पेयजल के लिए तरसाकर और छोटे किसानों के पंपों को बेकार करके इसकी कीमत वसूली जाती है। यह बिजली मुफ्त नहीं है, यह बहुत ज्यादा महंगी है। आइए इसकी कलई खोलकर इस बर्बादी को रोकें।
- द टाइम्स ऑफ इंडिया में 12 जून 2004 को प्रकाशित
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