जिम्मेदारी से जी चुराने की अदा

इन दिनों कोका कोला और पेप्सी कोला में पेस्टिसाइड्स (कीटनाशक) की उपयुक्त मात्रा को लेकर विवाद चल रहा है. भारतीय स्वामित्व वाले शीतल पेय पदार्थों के साथ ही यहां तक की भारत के दूध और पानी के साथ इनकी तुलना के कोई प्रयास नहीं किए गए हैं.

ब्रिटिश राज के दौरान गोरों पर जिम्मेदारी होने की अवधारणा का प्रचलन हुआ। रुडयार्ड किपलिंग द्वारा 1899 में लिखी गई कविता “व्हाइट मेन्स बर्डन” की नजर में भारतीय 'कानूनविहीन कमतर नस्ल' थी, जिनसे अच्छे स्तर या गुणवत्ता की अपेक्षा नहीं की जा सकती। लेकिन गोरों को वो एक ऐसी बेहतर नस्ल मानते थे जिनसे सर्वश्रेष्ठ स्तर की उम्मीद की जा सकती है। भारत में कोका कोला और पेप्सी द्वारा बनाए जा रहे सॉफ्ट ड्रिंक्स और बोतलबंद पानी में कीटनाशकों के स्तर को लेकर छिड़े विवाद में मैं इसी तर्क की चौंकाने वाली प्रतिध्वनि पाता हूं। द सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायर्नमेंट (सीएसई) के अनुसार इन कंपनियों द्वारा बनाए जा रहे सॉफ्ट ड्रिंक्स में डीडीटी जैसे कीटनाशक, यूरोपियन मापदंडों से 11 से 70 गुना ज्यादा हैं। कोक और पेप्सी ने इन आरोपों का खंडन किया है और स्वतंत्र जांच की मांग की है। इस दौरान नाराज मीडिया और सांसदों ने कानूनी कार्रवाई की मांग कर डाली है।

कोक में कीटनाशक की ज्यादा मात्रा की खबर ने मुझे भी आगबबूला कर दिया और इसके लिए मैं सीएसई का अहसान भी मानने लगा। फिर भी जहां तक मेरी बात है तो भारत में आम पेयजल में प्रदूषण मेरे लिए और अधिक गुस्सा दिलाने वाली बात है। पूरे भारत में पेयजल बेहद प्रदूषित है और इसमें घातक बैक्टिरिया भी मौजूद हैं।

मेरे युवावस्था के दिनों में लोग नल का, काफी कम प्रदूषित पानी ही पीया करते थे। नल से मुफ्त पानी आने के कारण किसी ने बोतलबंद पानी के बेचने की कल्पना तक नहीं की थी। लेकिन आज अधिकांश कस्बों और शहरों में नल का पानी स्वास्थ्य के लिए बहुत बड़ा खतरा बन गया है। इस स्थिति ने बोतलबंद पानी के लिए एक उच्चवर्गीय बाजार (अपर क्लास मार्केट) भी तैयार कर दिया है।

मलेरिया से लड़ने और खेती के लिए कीटनाशकों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है और यह हमारे भूजल में घुस गए हैं। क्लोरीन से भरपूर डीडीटी जैसे कीटनाशक हमारे खाद्य तंत्र (फूड चेन) और शरीर में जमा होते हैं और एक वक्त ऐसा आता है, जब इनका स्तर घातक हो जाता है। यह एक समस्या तो है, लेकिन पेयजल में मौजूद बैक्टिरिया से बहुत छोटी, जो हर साल लाखों लोगों की बीमारियों और मौत का कारण बनते हैं। फिर भी न तो मीडिया और न ही सांसद, अपरिष्कृत पानी पर निर्भर लाखों गरीबों के स्वास्थ्य को लेकर खतरे पर कुछ खास चिंतित दिखाई देते हैं। पूरा विवाद बस बोतलबंद पानी को लेकर है और उन बुलबुलेदार ड्रिंक्स को लेकर जो उच्च वर्ग द्वारा इस्तेमाल किए जाते हैं। यह मुझे अनातोली फ्रैंक की मजाकिया चुटकी की याद दिलाते हैं, 'गरीबों के खराब स्वास्थ्य की तो महज उम्मीद की जा सकती है, लेकिन रईसों के स्वास्थ्य की बेहतरी के लिए काफी कुछ किया जाना है।'

इससे भी बुरी बात यह है कि यह विवाद गोरों के दबदबे को लेकर पुरानी सोच पर लौटना है। इस विवाद में अप्रत्यक्ष सोच तो यही है कि भारतीय सप्लायरों से घटिया स्तर की अपेक्षा की जा सकती है, लेकिन गोरों के कार्पोरेशनों से ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती। सांसदों ने संसद में पेप्सी और कोक पर प्रतिबंध लगा दिया है। क्या पानी पर प्रतिबंध ज्यादा तर्कसंगत नहीं होगा? हमारे निम्न स्तर का सबसे ज्यादा सशक्त चित्रण तो यही तथ्य कर देता है कि सॉफ्ट ड्रिंक्स में कीटनाशकों की मात्रा को लेकर हमारे यहां कोई मापदंड ही नहीं है। पेप्सी और कोक को नियमों को तोड़ने का दोषी नहीं माना जा सकता, क्योंकि ऐसे कोई नियम है ही नहीं। ऐसा किसी त्रुटिवश या अनदेखी के कारण नहीं हुआ है। सांसदों-विधायकों (लेजिस्लेटर्स) ने जानबूझकर पानी की शुद्धता को लेकर कोई मापदंड या कायदा नहीं बनाया। अगर ऐसा करते तो वे भी सजा (सार्वजनिक जल वितरण के लिए वे ही जिम्मेदार हैं) के दायरे में आ जाते। उनकी सोच है कि भारतीय बाबू और नेताओं को तो परिणामों से बेफिक्र होकर किसी को भी मारने का हक है, लेकिन गोरों को आला दर्जे की गुणवत्ता का खयाल रखना चाहिए। कुछ अरसा पहले की बात है मीडिया और अदालतों ने रोहतांग पास के करीब चट्टानों को विज्ञापनों से पोत देने के लिए मल्टीनेशनल कंपनियों को जमकर फटकार लगाई थी। इसे 'चट्टानों से बलात्कार' की संज्ञा दी गई थी, जिसने पर्यावरण को बर्बाद कर दिया। लेकिन, जैसा कि स्तंभकार कनिका दत्ता बता चुकी हैं, भारत का हर स्मारक और पर्यटन स्थल, हजारों भारतीयों द्वारा उकेरे गए संदेशों और फतियों से पटा पड़ा है। न तो अदालतें और न ही अखबार उसे बलात्कार का नाम देते हैं। वे शायद किपलिंग की बात को मान चुके हैं कि भारतीयों से बेहतरी (जो एक कानूनविहीन कमतर नस्ल है) की अपेक्षा नहीं की जा सकती, हां गोरों को ऊंचे स्तर का खयाल रखना चाहिए।

बात को थोड़ा और लंबा खींचने के जोखिम के साथ मैं भोपाल की यूनियन कार्बाइड त्रासदी याद दिलाना चाहूंगा। इस त्रासदी में तीन हजार लोगों की जान गई थी और कई लोग हमेशा के लिए विकलांग हो गए थे। मुझे उम्मीद थी कि यह त्रासदी सुरक्षा के ऊंचे मापदंडों को लेकर सजगता बढ़ाएगी और बेहतर स्तर की मांग पैदा करेगी। इसके बाद के सालों में मैंने कई औद्योगिक हादसों (लगभग हमेशा सार्वजनिक क्षेत्र में) पर संपादकीय लिखे। मैंने पाया कि कोयला खदानों, बांध स्थल, रेलवे में दुर्घटना, विस्फोट आदि में हर साल तकरीबन दो हजार लोग मारे जाते हैं। इस पर कहीं कोई सार्वजनिक आक्रोश नहीं फूटता। वह तो बस यूनियन कार्बाइड और उसके गोरी चमड़ी वाले अध्यक्ष (एक ऐसा दिखावटी प्रमुख जिसके पास खास अधिकार नहीं) पर ही उतरता है। सार्वजनिक क्षेत्र में हजारों लोगों की मौत पर कोई आक्रोश नहीं फूटा और न ही राष्ट्रपति (जो सार्वजनिक क्षेत्र के बिना अधिकारों वाले प्रमुख हैं) पर मुकदमे का ही कोई प्रयास किया जाता है। मुझे उम्मीद है कि कोक और पेप्सी पर नाराजगी से जनता में जागरूकता आएगी। लेकिन यह भय भी है कि यह कहीं गोरों को जिम्मेदार मानने की किपलिंग की सोच के पथभ्रष्ट रूप की आड़ में दबा न दी जाए। हमारी पथभ्रष्ट सोच यह है कि गोरों का वर्चस्व उनके कारोबार पर प्रतिबंध का एक अच्छा कारण है मगर भारतीयों को मारने की खुली छूट दे दो। कितना अफसोसनाक है। आप किपलिंग को यह कहते हुए सुन सकते हैं, 'मैंने ऐसा पहले ही कह दिया था।'

- टाइम्स ऑफ इंडिया में 3 सितंबर 2000 को प्रकाशित