पूँजीवाद और लोभ

अर्थशास्त्र आर्थिक प्रतिमानों, सैद्धांतिक प्रमाणों और अविवेकपूर्ण बुद्धिशीलता का विज्ञान बनने से पहले एक नैतिक दर्शन के नाम से जाना जाता था तथा इस बात से संबद्ध था कि व्यक्ति अपना जीवन कैसे बिताता है। 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध के दौरान एडम स्मिथ द्वारा जीवन का एक व्यापक दर्शन प्रस्तुत किया गया। अपनी अनूठी कृति दि वेल्थ ऑफ नेशंस में एडम स्मिथ ने स्व-हित पर आधारित एक अर्थव्यवस्था का वर्णन किया है। यह व्यवस्था जो बाद में पूंजीवाद के नाम से जानी गई, इस प्रसिद्ध उद्धरण में वर्णित है:

हम अपने भोजन की उम्मीद कसाई, पेय बनानेवाले या नानबाई की उदारता से नहीं करते बल्कि अपने स्व-हित के प्रति उनके आदर से करते हैं। हम अपने आप से उनकी मानवता के बारे में बात नहीं करते बल्कि उनके स्व-प्रेम की बात करते हैं और उनसे कभी भी अपनी आवश्यकताओं का जिक्र नहीं करते बल्कि उनके नफे का उल्लेख करते हैं।

अत: स्व-हित का बल ही किसी व्यक्ति के क्रियाकलापों को निर्धारित करता है। पूंजीवादी समाजों के इस व्यावहारिक धर्म की तुलना ईसाई धर्म की सोच या नैतिकता के किसी भी पैमाने पर करना मुश्किल है। निश्चित तौर पर ईसा के उपदेश में यह तथ्य निहित है कि किसी व्यक्ति के कार्यों का मार्गदर्शक स्व-हित के बजाय पड़ोसियों के प्रति प्रेम व दया-भाव होना चाहिए।

लेकिन यह मैं उनसे कहता हूं जो मुझे सुन रहे हैं: अपने शत्रुओं को प्यार करो, जो तुमसे घृणा करते हैं उनसे अच्छा व्यवहार करो, जो तुम्हें शाप देते हैं उन्हें आर्शीवाद दो, जो तुमसे बुरा व्यवहार करते हैं उनके लिए प्रार्थना करो। जो व्यक्ति तुम्हारे एक गाल पर मारे उसकी ओर तुम अपना दूसरा गाल भी बढ़ा दो, जो व्यक्ति तुम्हारा लबादा तुमसे ले ले उसे अपना कुर्ता देने से इनकार न करो। जो कोई भी तुमसे कुछ माँगे उसे दे दो और जो व्यक्ति तुम्हें लूटकर चला जाए उससे अपनी संपत्ति वापस न माँगो। तुम अपने लिए जैसे व्यवहार की अपेक्षा करते हो वैसा ही दूसरों के साथ करो। और यदि तुम वापस पाने की आशा के साथ किसी को उधार देते हो तो तुम धन्यवाद की अपेक्षा कैसे कर सकते हो? यहाँ तक कि पापी भी पापियों को उधार देते वक्त उस राशि के वापस मिल जाने की आशा  करते हैं। अत: अपने शत्रुओं को प्यार करो व उनसे अच्छा व्यवहार करो और उधार देते समय वापसी की आशा न करो।

ईसा ने हमें यह भी सिखाया:

''... किसी भी धन-लोलुपता के खिलाफ अपनी रक्षा करो, क्योंकि किसी व्यक्ति का जीवन उसके द्वारा अर्जित की गई वस्तुओं से सुरक्षित नहीं होता, बेशक उसके पास उसकी जरूरत से ज्यादा हो।''

ईसा का संदेश निश्चित रूप से एडम स्मिथ के इस मत से भिन्न दिखता है कि व्यक्तिगत लाभ के लिए संघर्ष करना एक प्राकृतिक मानवीय लक्षण है जिसे समाज में लगभग खुली छूट दे देनी चाहिए। लेकिन, ईसाई धर्म और पूंजीवाद के मूलभूत नैतिक आधारों में शायद परस्पर विरोध है, अत: ऐसी दलील रखी जा सकती है कि पूंजीवाद पर आधारित एक अर्थव्यवस्था के उत्तरपरिणाम में समाज का उध्दार करने के गुण मौजूद हैं।

चुनौती

इस दलील को समझने के लिए हमें अधोलिखित लक्ष्य तय करने होंगे: समाज को बेहतर बनाना और अपने संगियों को लाभ पहुंचाना। एक ईसाई जीवन जीते हुए इस लक्ष्य को हासिल करना सरल है। पर एक पूंजीवादी समाज में इस लक्ष्य को कोई कैसे प्राप्त कर सकता है जहाँ स्व-हित प्रबल आर्थिक सिद्दांत के रूप में विद्यमान है?

इस सवाल का जवाब एडम स्मिथ ने वेल्थ ऑफ नेशंस के बहुप्रसिद्ध अंश में दिया है:

...हर व्यक्ति, जहाँ तक हो सके, अनिवार्य रूप से समाज के वार्षिक राजस्व में योगदान करने को श्रम करता है। आम तौर पर उसकी मंशा सच में सार्वजनिक हित को बढ़ावा देने की नहीं होती है, न ही वह जानता है कि वह इसे कितना बढ़ावा दे रहा है....अपना लाभ ही उसकी मंशा होती है और वह उसमें, साथ ही कई अन्य मामलों में, किसी अदृश्य कमान द्वारा संचालित होता हुआ ऐसे सिरे को बढ़ावा दे रहा होता है जो उसकी मंशा का हिस्सा था ही नहीं। न ही समाज के लिए यह कभी बुरा होता है कि वह इसका हिस्सा नहीं था। अपने स्व-हित के लिए कदम बढ़ाते हुए वह बारम्बार समाज के हितों को ही बढ़ावा देता है। और वह उस समय की अपेक्षा कहीं बेहतर तरीके से समाज के हितों को बढ़ावा दे रहा होता है जब वह वाकई उसे बढ़ावा देना चाहता हो।

यह सिध्दान्त स्पष्ट रूप में मेरे सामने उस वक्त प्रदर्शित हुआ, जब 1967 के "ग्रेट स्नोस्टार्म" (बड़ा बर्फीला तूफान) के दौरान मैं शिकागो में अंडर ग्रेजुएट का छात्र था-यह तूफान 1968, 69, 70....81 के "ग्रेट शिकागो स्नोस्टार्म" (शिकागो का बड़ा बर्फीला तूफान) से बिल्कुल भिन्न था।

उस समय मैं जहाँ रह रहा था, उसे उदारतापूर्वक झुग्गी ही कहा जा सकता है। उस जगह की उचित तौर पर सही तस्वीर खींचने के लिए, डिकेन्स के उपन्यास के अपेक्षाकृत रूखे अंशों की छवियों को याद करना, लक्ष्य से भटकने जैसा नहीं होगा। मेरी दिनचर्या में स्कूल या काम पर जाना और अंतहीन अध्ययन शामिल था, या ऐसा ही दिखता था। जीवन का वह मामूली सा आनंद जो मेरी एकरसता को तोड़ने में मदद करता था, वह था स्थानीय ढाबे की ओर मेरा दोपहर को जाना, जहाँ विश्व के  सबसे बेहतरीन इटेलियन बीफ सैंडविच बनाए जाते थे।

जनवरी में साप्ताहांत के दौरान वार्षिक परीक्षा के लिए गहन पढ़ाई करते हुए अपने दोपहर के भोजन के लिए मैं व्यग्रता से इंतजार भी कर रहा था। ठीक 12.00 बजे जैसे ही मैंने ''सैल्वातोर्स डेली'' जाने के लिए- जो बस एक फर्लांग भर था - दरवाजा खोला, बर्फ की एक ठोस दीवार ने मेरा मार्ग अवरुद्ध कर दिया। जो कोई भी शिकागो में रह चुका है, कम-से-कम कुछ सालों के लिए भी, उसके लिए यह कोई असामान्य नजारा नहीं। पर यह स्थिति इसलिए अलग हटकर थी कि मुझे लगा कि इतना दिन चढ़ जाने के बाद आखिर बर्फीला तूफान उठा कैसे? चूंकि मेरी खिड़कियों पर दफ्ती लगी हुई थी (एक अस्थायी तरीके की तूफानरोधी खिड़की) ताकि बाहर की ठंडक अंदर न आ जाए। इसलिए मुझे थोड़ा भी अंदाजा नहीं था कि पिछली रात आखिरकार किस भारी तूफान ने शहर पर कहर बरपाया था।

स्थिति का तत्क्षण आकलन करने के बाद मैं खिल उठा कि वार्षिक परीक्षा स्थगित कर दी जाएगी और मुझे पढ़ाई करने के लिए पुन: एक और सप्ताह मिल जाएगा। कुछ ही देर बाद जब मैंने अपनी भोजन सामग्री के भंडार को देखा तो मेरे शुरुआती आह्लाद पर पानी फिर गया और मुझे लगा कि पुन: अपनी भोजन सामग्री का भंडारण मेरा पहला काम होगा। उससे भी बुरा तो यह है कि ''सैल्वातोर्स डेली'' निश्चित रूप से बंद होगा क्योंकि शैफ जिस उपनगर में रहता है, वहाँ से कतई नहीं आ पाया होगा। मेरे लिए एकमात्र उपाय यही था कि मैं बर्फ के बीच से रास्ता बनाता हुआ नजदीकी ''मॉम एंड पॉप'' किराने की दुकान तक जाऊं।

बर्फ के रास्ते खासी मेहनत के साथ रास्ता बनाते और आगे बढ़ते, अंतत: मैं दुकान पहुँचा। पर वहाँ पहुंचकर मैंने जो देखा वह "दि टिवलाइट जोन" (क्षय काल) जैसा था। दराजें खाली पड़ीं थीं और बचे हुए सामान में आंकोवी के टिन एवं हाथी-चक (आर्टीचोक) के डिब्बे बिखरे पड़े थे। मेरे मन में भय घर करने लगा था और मुझे ठंडे पसीने आने लगे थे। उस क्षेत्र में सिर्फ एक और किराने की दुकान थी, पर मुझे इस बात की आशा न के बराबर थी कि वहाँ का नजारा इससे कुछ अलग होगा। अत: आप मेरे उस वक्त आश्चर्य का अंदाजा नहीं लगा सकते हैं, जब मैंने उस दुकान में प्रवेश करते ही पाया कि उसकी दराजें पर्याप्त किराने से भरी हुई हैं, हालाँकि दुकान खाली पड़ी थी। जिस तरह से मैं पूरी दुकान में घूम-घूमकर कोक, टिवकींज, स्नीकर्स और जीवन की अन्य आवश्यक वस्तुओं को एकत्र कर रहा था, यह कीस्टोन कॉप्स के चलचित्र के किसी दृश्य जैसा था। लेकिन मेरे आनंद के वे छोटे से पल पुन: काफूर हो गए जब बाहर निकलने के रास्ते पर आकर मैंने देखा कि एक बोर्ड पर लिखा था- "सभी किराने का मूल्य अस्थायी तौर पर दोगुना कर दिया गया है। "  मेरी खुशी गुस्से में तब्दील हो गई और मैंने खाली हाथ दरवाजे को पीटना शुरू कर दिया।

दरवाजे से कई फुट आगे, मीलों तक फैली बर्फ को जब मैंने देखा और बर्फीली हवा मेरे नथुनों में भरने लगी तो मेरे उसूल और आदर्शों की जगह मेरे विवेक और जीने की इच्छा ने ले ली। मैं लौटकर अपनी खास जरूरत की सामग्री को खरीदने लगा। एकमात्र "आदर्शवाद" जो मेरे अंदर रह गया था, वह था बर्फ के रास्तों से वापस घर जाते वक्त मैं झ्रुंझलाता हुआ लौटूं।

इस कहानी का सूत्र-वाक्य यही है कि किराने की दुकान खुली रही और पूरे सप्ताह के दौरान जब सामान्य आपूर्तियाँ रुक गईं थीं, यह दुकान कुछ हद तक किराना मुहैया कराती रही। यह बाद में मुझे मालूम हुआ कि किराना दुकान के मालिक ने बच्चों को पैसे दिए कि वे अपनी हिम-गाड़ियों को नजदीकी सब्जी और माँस भंडार जाकर जो कुछ भी वे खरीद सकें, या उनकी गाड़ियों में आ सके, उनसे भर लें।

क्रियाशील पूंजीवाद

"दि वेल्थ ऑफ नेशंस" बर्फीले तूफान के मेरे अनुभव जैसे उदाहरणों से भरी पड़ी है। लेकिन शायद एडम स्मिथ के उदाहरणों की 18वीं शताब्दी की पृष्ठभूमि के कारण मुझपर उतना प्रभाव कभी भी नहीं पड़ा जितना कि पूंजीवादी व्यवस्था के क्रियाकलापों संबंधी मेरे प्रत्यक्ष अनुभव से पड़ा था। यह सिद्धांत कि निजी दुर्गुण सार्वजनिक सद्गुण का मार्ग प्रशस्त करती है, इस सिद्धांत के प्रति मेरे मन में इससे ज्यादा कितना समर्थन हो सकता था? एक तरफ हमारे सामने एक ऐसा दुकान-मालिक है जो ईमानदार काम करने के हित से कीमतों को नहीं बदलता और अपना सारा सामान जल्दी से बेचकर पूरे सप्ताह के लिए अपनी दुकान बंद कर देता है। मुझे विश्वास है कि वह काफी आत्मसंतोष महसूस कर रहा होगा कि उसने जरूरत के नाजुक समय के दौरान अपने ग्राहकों का शोषण नहीं करते हुए एक सदाचारपूर्ण और अच्छा काम किया है।

उच्च आदर्शवाद के इस उदाहरण के ठीक विपरीत हमारे सामने एक पूंजीवादी का उदाहरण है जो अपने लाभांश को अधिकतम करने के अवसर को हाथ से निकलने नहीं देता, फिर भी ऐसा करते हुए, उसने लोगों को अपनी खरीदारी को वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार ही सीमित करने को बाध्य किया। इसके साथ ही ऊंची कीमतों से लालची किराना-मालिक को यह छूट भी मिली कि वह बच्चों को उनकी गाड़ियों के नए इस्तेमाल के लिए पैसे दे पाए, जिससे बिक्री के लिए उपलब्ध भोजन सामग्री की आपूर्ति में इजाफा हुआ। जैसा कि उपरोक्त उद्धरण में एडम स्मिथ ने कहा है "अपने स्व-हित के लिए कदम बढ़ाते हुए वह बारम्बार समाज के हितों को ही बढ़ावा देता है। और वह उस समय की अपेक्षा कहीं बेहतर तरीके से समाज के हितों को बढ़ावा दे रहा होता है, जब वह वाकई उसे बढ़ावा देना चाहता हो।"

यह दलील दी जा सकती थी कि ऊंची कीमतें, जबकि यह माना जा सकता है कि इसमें कुछ अंतर्निहित लाभ विद्यमान थे, गरीबों के खिलाफ भेदभावपूर्ण थीं। इस दलील का जवाब देने के सिलसिले में मैं आपको विश्वास दिला सकता हूं कि आसपास के क्षेत्र में मुझसे गरीब कोई नहीं था। फिर भी मैं स्व-हित की शक्तियों से वृह्त रूप में लाभान्वित हुआ। मुझे इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि ज्यों ही पूंजीवादियों ने अपने लाभांशों को बढ़ाने के लिहाज से उच्च कीमत वाले सामान की और ज्यादा आपूर्ति करने के लिए उठापटक शुरू की, ऊंची कीमतों की जगह कम कीमतों ने ले ली।

यहां हम पूंजीवाद को कार्यशील देखते हैं और पहली नजर में यह एक मनभावन दृश्य नहीं है। लोभ द्वारा उकसाए गए पूंजीवादी अपने लाभांशों को अधिकतम करते हुए अपने खुद के लाभ की कामना रखते हैं। हालांकि बाजार की शक्तियां इस तरह इस निजी दुर्गुण को सार्वजनिक सद्गुण में बदल डालती हैं। इस तरह लोभ पर आधारित जीवन को जीना, जो ईसाई नैतिकता के विरुद्ध दिखता है, उपरोक्त वर्णित उस लक्ष्य को पूरा करने में काफी सक्षम हो सकता है- तात्पर्य यह है कि समाज को बेहतर करने और हमारे संगी-साथियों को लाभान्वित करने के लिहाज से। दरअसल, बौद्धिक चिंतन के इतिहास में एडम स्मिथ का योगदान पूंजीवाद का आविष्कार नहीं बल्कि स्व-हितैषी व्यक्तियों की सैद्धांतिक अंतर्दृष्टि को दर्शाना है कि कैसे वे खुद को लाभ पहुंचाने से ज्यादा समाज को लाभान्वित करते हैं।

मैं इस दलील को एक और कदम आगे नहीं बढ़ाना चाहता। न सिर्फ मुझे विश्वास है कि स्व-हित समाज को लाभान्वित करता है बल्कि मुझे यह संतोष भी है कि यह एकमात्र जरिया है जिसमें एक आधुनिक अर्थव्यवस्था के तहत वस्तुओं का उत्पादन व वितरण हो सकता है।

इस पर विचार करने के लिए, आइए हम अपने समाज में बेची जाने वाली सारी वस्तुओं के बारे में सोचें, जिनका हम रोज उपभोग करते हैं। क्या हम जानते हैं कि इन वस्तुओं का उत्पादन किसने किया? क्या हम यह भी जानते हैं कि कैसे और कहाँ इनका उत्पादन हुआ? संभवत: नहीं। वस्तु उत्पादन और सेवाओं में योगदान दे रहे लाखों लोगों की वजह से एक आधुनिक समाज में श्रम को विशिष्टता प्रदान करना बहुत जरूरी है। श्रमिकों की ओर से ऐसा योगदान किया जाना समाज की सेवा करने की परोपकारवादी आकांक्षा का नतीजा नहीं है बल्कि खुद की सेवा करने की आधारभूत आकांक्षा की वजह से है।

कभी-कभी, निश्चित रूप से, परोपकारवाद लोगों के लिए प्रमुख प्रेरणादायक शक्ति के रूप में काम कर सकता है। यह शक्ति, दोस्तों और पारिवारिक सदस्यों के बीच के रिश्तों में सबसे मजबूत होती है पर यह दूसरों के लिए भी विद्यमान हो सकती है। इसका उदाहरण वह है जो ''फूड फॉर द हंग्री'' (भूखों को भोजन) के लिए योगदान करता है। सच है विश्व को भूख से निजात दिलाने में योगदान करना एक धर्मार्थ कार्य है जो उस प्रेम, दया और आदर का प्रतीक है जो एक व्यक्ति, मानवता के लिए महसूस करता है। फिर भी, ऐसा धर्मार्थ कार्य आवश्यक रूप से आय का एक स्वैच्छिक पुनर्वितरण है। यह धर्मार्थ वस्तु के वास्तविक उत्पादन को कतई नहीं दर्शाता। अंतत: विश्व को भूख से मिलने वाली कोई भी राहत अनगिनत किसानों, भोजन निर्माताओं, वितरकों, मालवाहकों और अन्य नि:स्पृह व्यक्तियों द्वारा भोजन उत्पादन करने के परिणामस्वरूप मिलती है जिसे धर्मार्थ व्यक्ति भूखे लोगों के लिए खरीद सकते हैं।

एडम स्मिथ ने "दि वेल्थ ऑफ नेशंस" के एक अंश में, जो मुझे बहुत प्रिय है, इन सारी बातों को एक ज्यादा स्पष्ट और जोरदार तरीके से कहा है: "किसी सभ्य समाज में अत्यधिक सहायता व सहयोग की जरूरत के समय वह (मनुष्य) हमेशा उपस्थित रहता है, जबकि उसकी पूरी जिंदगी इतने भर ही होती है कि वह चंद लोगों की ही मित्रता प्राप्त कर पाए।"

यह वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण है कि "लोभ" का अर्थ इतना बुरा माना जाता है। पर बिना इसके हमारे घर के अंदर नल नहीं लगाए जाते, क्लॉक रेडियो नहीं होते, यहाँ तक कि दक्षिणी कैलिफोर्निया में पानी तक नहीं होता। और, इसका मतलब यह है कि इसके न होने पर, हममें से कुछ, शिकागो में कुछ और "ग्रेट स्नोस्टार्म्स" (भयानक बर्फीले तूफान) से जूझ रहे होंगे।

लेखक: 
जेम्स एल. डोटी व डिवट आर. ली द्वारा संपादित
प्रकाशित: 
"द मार्केट इकॉनॉमी: ए रीडर"
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