जिन्ना तो बस एक गोटी हैं - डा. वेद प्रताप वैदिक
यदि जसवंतसिंह को जिन्नावाली किताब के कारण निकाला गया है तो यह घटना भाजपा का शाश्वत कलंक कहलाएगी| किसी पार्टी का संसदीय बोर्ड इतना गैर-जिम्मेदाराना फैसला कैसे कर सकता है? संसदीय बोर्ड किसी भी पार्टी का दिलो-दिमाग होता है| लगता है, शिमला में उसे ठंड लग गई| पुस्तक-विमोचन के 26 घंटे में ही जसवंतसिंह का निष्कासन किस बात का सबूत है? क्या इसका नहीं कि पुस्तक को पढ़े बिना ही हमारे भगवा मौलानाओं ने फतवे जारी कर दिए| 669 पृष्ठ की पुस्तक को नेता लोग तो क्या, मंजे हुए विद्वान भी एक दिन में नहीं पढ़ सकते| पार्टी का संसदीय बोर्ड तो सरकार के मंत्रिमंडल से भी अधिक शक्तिशाली निकाय होता है| यह निकाय अगर अपने एक वरिष्ठ साथी पर इस तरह अचानक गाज गिरा सकता है तो उस पर क्या भरोसा किया जाए? यह किसी भी देश पर अकारण ही परमाणु बम भी गिरा सकता है| ऐसे गैर-जिम्मेदार संसदीय बोर्ड को भाजपा कार्यकर्ता क्यों बर्दाश्त करें? ऐसे बोर्डवाली पार्टी को सत्तारूढ़ करने के पहले भारत की जनता को सौ बार सोचना होगा|
सबसे बड़ा आश्चर्य तो यह है कि लालकृष्ण आडवाणी संसदीय बोर्ड के सबसे वरिष्ठ सदस्य हैं और उनके रहते जसवंतसिंह को निकाल दिया गया| आडवाणी चुप क्यों रहे? यदि चुप रहे तो उनका अपराध भीष्म और द्रोणाचार्य से भी अधिक संगीन है| वे खुद जिन्ना के मारे हुए हैं| उनका जिन्ना जसवंतसिंह के जिन्ना से कहीं ज्यादा खतरनाक था| अगर हम आडवाणी के जिन्ना और जसवंतसिंह के जिन्ना की तुलना करें तो इस नतीज़े पर पहुंचेंगे कि जसवंतसिंह को अगर पार्टी-निकाला दिया गया तो आडवाणी को कम से कम देश-निकाला तो दिया ही जाना चाहिए था| जसवंतसिंह ने अपनी पूरी पुस्तक में जिन्ना को कहीं भी 'महान' और 'धर्म निरपेक्ष' नहीं कहा है, जैसा कि आडवाणी ने जिन्ना के समाधि-स्थल की पुस्तिका में लिखा था| जसवंत की पूरी किताब पढ़ने पर ऐसा लगता है कि उन्होंने जगह-जगह जिन्ना को अतिवादी, घंमडी, अकड़बाज़, अदूरदर्शी, अंग्रेजियत का पुतला और 'विफल' राजनेता बताया है| सारे इतिहासकार मानते हैं कि जिन्ना अपने लक्ष्य में सफल रहे लेकिन जसवंतसिंह ने पाकिस्तान की वर्तमान दुर्दशा और भारत के मुसलमानों की दुविधा के आधार पर जिन्ना को 'विफल' बताने की कोशिश की है| उन्होंने जिन्ना के द्विराष्ट्रवाद का स्पष्ट विरोध किया है| उन्होंने भारत के एक और विभाजन की आशंका पर चिंता जताई है| ऐसे जसवंतसिंह को जिन्नावादी कहकर निकाल देना पहले दर्जे की मू़ढ़ता है| यह ग्रंथ जसवंतसिंह ने आत्म-शिक्षण के लिए लिखा है| 'सेकेंडरी सोर्सेज़' के आधार पर लिखे गए इस ग्रंथ के गुण-दोष का विवेचन करना यहां बिल्कुल भी अभिप्रेत नहीं है लेकिन यह तो मानना पड़ेगा कि भाजपा संसदीय बोर्ड ने इस सीधी-सादी सी किताब को असाधारण महत्व प्रदान कर दिया है| जसवंतसिंह भाग्यशाली हैं कि अब वे लोकप्रिय लेखकों या विद्वानों के श्रेणी में शुमार हो जाएंगें| आडवाणी की आत्मकथा से कई गुना ज्यादा जसवंत की जिन्ना-कथा बिकेगी|
अभी तक जिन्ना के जिन्न के कारण संघ और आडवाणी, दोनों ही उल्टे लटके हुए हैं| अब इस तमाशे में जसवंत भी जुड़ गए हैं| संघ ने पहले आडवाणी को निकाला और फिर बुला लिया| वे लौट आए लेकिन वे जिन्ना पर कायम रहे| संघ भी नहीं बदला| दोनों अपनी-अपनी दुम दबाए हुए हैं| दोनों एक-दूसरे की मजबूरी हैं| लेकिन बेचारे जसवंतसिंह फिजूल में मारे गए| जसवंत का कोई दोष नहीं, फिर भी निकाल दिए गए| उन्होंने अपनी विनम्रता और शिष्टता में जरा भी कमी नहीं आने दी है| वे तो आडवाणी जितने कड़वे भी नहीं हैं| क्या उनकी भी घर-वापसी नहीं होगी? मोहन भागवत कहते हैं कि जसवंत के निष्कासन से उनका कुछ लेना-देना नहीं| सही है| तो फिर वे क्यों निकाले गए?
निकाले जाने का कारण किताब नहीं है, भाजपा ही है| पहले जिन्ना का बहाना बनाया गया लेकिन जब लोगों ने कहा कि जसवंत से बड़े जिन्नाप्रेमी तो अभी भी पार्टी के सिरमौर हैं तो पार्टी ने पल्टा खाया| उसने जिन्ना को छोड़ा और वह पटेल को पकड़ लाई| जसवंत के प्रतिद्वंद्वी किताब पढ़े बिना ही कहने लगे कि जसवंत ने पटेल की निंदा की है| सच्चाई तो यह है कि जसवंत ने पटेल को बचाया है| पूरी किताब में छह जगह पटेल का जि़क्र है| पटेल की निंदा डॉ. राममनोहर लोहिया ने 'भारत-विभाजन के अपराधी' में और मौलाना आजाद ने 'इंडिया विन्स फ्रीडम' में जिन कड़े शब्दों में की है, जसवंत उसके आस-पास भी नहीं फटक सके हैं| लोहिया ने नेहरू और पटेल पर आरोप लगाया है कि उन्होंने गांधी को धोखा दिया और उनकी पीठ पीछे विभाजन स्वीकार कर लिया| उन्होंने गांधी के प्रति नेहरू और पटेल के बर्ताव को 'भद्दा' और 'टुच्चा' कहा है| जैसे अनेक मौलिक इतिहासकारों ने नेहरू और पटेल को विभाजन के लिए कुछ हद तक जिम्मेदार ठहराया है, ठीक उनकी नक़ल पर जसवंतसिंह ने भी ठहरा दिया है| इसमें उन्होंने कौनसी ऐसी नई बात कह दी कि कांग्रेस और भाजपा दोनों बौखला गए? गुजरात सरकार का प्रतिबंध तो बिल्कुल मूर्खतापूर्ण है| क्या पटेल सिर्फ गुजरात के नेता थे? भारत को उन पर गर्व है| वे भारत के नेता थे| लेकिन अपने नेताओं के बारे में हम खुलकर लिख-पढ़ न सकें, यह कौनसी देशभक्ति है? गुजरात के कांग्रेसी प्रतिबंध का समर्थन कर रहे हैं और राष्ट्रीय नेतृत्व उसका विरोध कर रहा है| क्या ऐसा मज़ाक पहले कभी हुआ है?
जसवंत न जिन्ना के कारण निकाले गए हैं और न पटेल के कारण! जिन्ना और पटेल, दोनों के बिना संघ नहीं रह सकता| बिना नायक और खलनायक के कोई पिक्चर चलती है, क्या? संघ के पास दोनों ही नहीं हैं| उन्हें उधार ले लेना उसकी मजबूरी है| उसने एक मुस्लिम लीग से उधार ले लिया और दूसरा कांग्रेस से उधार ले लिया| वह जिन्ना की निंदा जमाते-इस्लामी के मौलाना मौदूदी से भी ज्यादा करता है और पटेल की प्रशंसा कांग्रेसियों से भी ज्यादा करता है| मुद्दई सुस्त और गवाह चुस्त! 70 साल पुरानी यह पिक्चर संघ के थियेटर में अभी तक लगी हुई है, कोई इसे देखे या न देखे| जसवंतसिंह जिज्ञासु हैं| वे भी इस पिक्चर को देखने चले लेकिन बीच में ही फंस गए| भाजपा के दादाओं ने उन्हें चलती पिक्चर में दबोच लिया| वे पहले से घात लगाए बैठे थे| किताब गलत मौके पर आ गई| वह साल भर-पहले या बाद में आ जाती तो वह आई-गई हो जाती|
जसवंत कभी स्वयंसेवक नहीं रहे| उनके सबसे बड़े संरक्षक अटलजी थे| अटलजी अब मौन हैं| वे जब प्रधानमंत्री थे, तब भी संघ ने उन्हें वित्तमंत्री बनने से रूकवा दिया लेकिन अटलजी ने बाद में उन्हें एक से एक महत्वपूर्ण पद दे दिए| यह घनीभूत जलन अब लावे की तरह बह निकली| जसवंत ने क्यों पूछा कि पार्टी की हार के लिए जिम्मेदार कौन है? जो जिम्मेदार हैं, उन्होंने पलटवार किया| पहले उन्हें संसदीय दल के उप-नेता पद से वंचित किया गया और अब उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया, जिन्ना और पटेल के दुशाले ओढ़ा कर! भाजपा ने जिन्ना और पटेल को क्यों घसीटा? वह सीधे ही अरूण शौरी, यशवंत सिन्हा और जसवंत को निकाल देती तो बेहतर होता| माना जाता कि भाजपा भी अन्य पार्टियों की तरह है| कुछ नेता निजी सत्ता-संर्घष की बलि चढ़ गए लेकिन अब क्या छवि बन रही है? यह छवि अन्य पार्टियों से भी बदतर है| नेता मसखरे दिख रहे हैं और पार्टी मज़ाक| विचारधारा तो बहुत दूर की बात है, यहां विचार का ही अंत हो रहा है| राष्ट्रभक्ति के आसन पर आत्म-भक्ति आ बैठी है| जिन्ना और पटेल को गोटियों की तरह चला जा रहा है|
- डा. वेद प्रताप वैदिक
राजनीतिक विचारक,
पूर्व संपादक - नवभारत टाइम्स
एवं पीटीआई भाषा
(dr.vaidik@gmail.com)
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