संस्थागत परिवर्तनों को प्रोत्साहन - जेसन सोरेंस
कम से कम तीस साल हो गए जबकि शैक्षिक अर्थशास्त्र में मुक्त-बाजार के विचार का वर्चस्व रहा है। आज़ादी समर्थक विचारकों के पास पर्याप्त धन है और प्रभाव भी। इन तमाम प्रोत्साहक घटनाओं के बाद भी सरकार का कुल आकार बढ़ता ही जा रहा है। अमेरिका में दोनों ही राष्ट्रीय दल, वाकई शब्दों में न सही काम के लिहाज से तो सरकार के आकार को बढ़ाने और आज़ादी को कम करने के ही काम के प्रति समर्पित हैं। सही विचार और उनके प्रभावी तरीके से प्रचार ने राजनीति में पर्याप्त बेहतर परिवर्तन नहीं किए हैं। हमें विचार और उनका उचित तरीके से प्रचार की जरुरत है, लेकिन केवल इतनी ही रणनीति पर्याप्त नहीं होगी।
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उदारवादी
चिंतक मिल्टन फ्रीडमेन
केपिटलिज्म ऐंड फ्रीडम में फ्रीडमेन ने बाज़ार की अर्थव्यवस्था की स्टडी को गुमनामी से निकाल करे जमीनी हकीकतों के साथ पेश किया. अन्य चीजों के साथ-साथ उनका तर्क स्वेच्छा से बने सैनिक, मुक्त रूप से चलायमान विनिमय दर, डॉक्टरों के लिए लाइसेंस प्रथा को खत्म करना, नकारात्मक आयकर और शिक्षा वाउचर प्रणाली के लिए भी था. (फ्रीडमेन मिलीट्री ड्राफ्ट के कट्टर विरोधी थे. एक बार उन्होंने कहा था कि सिर्फ इस ड्राफ्ट के उन्मूलन के लिए उन्होंने कांग्रेस का समर्थन किया था।) हालांकि उनकी पुस्तक की ज्यादा बिक्री नहीं हुई पर काफी युवाओं जिन्होंने यह पुस्तक पढ़ी अर्थशास्त्र पढ़ने के लिए प्रेरित हुए। उनकी पुस्तक “फ्री टु चूज़” (Free to Choose), जो उन्होंने अपनी पत्नी रोज़ फ्रीडमेन के साथ मिल कर लिखी, से उनके विचार पूरी दुनिया में फैले जो 1980 की बेस्टसेलर नॉन फिक्शन पुस्तक थी. यह पुस्तक सरकारी प्रसारण व्यवस्था (Public Broadcasting System) पर आधारित एक टीवी श्रृंखला की सहायता के लिए लिखी गई थी. इस किताब मदद से मिल्टन फ्रीडमेन का नाम घर-घर जा पहुंचा.
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