कहाँ
है विजन?
इस
बार रेल मंत्री के पास एक मौका था, लोकलुभावन से हटकर रेल
को विकास के पथ पर कदम ताल मिलाने का मौका देने का क्योंकि
अगले साल जब बजट पेश किया जाएगा तो उस समय उनके सामने पश्चिम
बंगाल के विधानसभा चुनाव मुंह बाए खड़े होंगे और सत्ता पाना
उनकी प्राथमिकताओं में सर्वोपरि होगा।
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खुलेपन
की नीतियों की दरकार- बी.आर.शिनॉय
इस
लेख में चुनाव से ठीक पहले जारी राजनैतिक दलों के घोषणापत्रों
की आलोचना की गई है। लेखक के मुताबिक केवल जनसंघ का घोषणा-पत्र
ही अर्थव्यवस्था के सरकारीकरण के खिलाफ है। हालांकि इसमें
भी आधारभूत मामलों को लेकर स्पष्टता का अभाव ही है। पीएसपी
और कांग्रेस जिस प्रगति की बात कर रहे हैं, वह केवल कुछ
अतिप्रिय हठों को दूर करके ही हासिल की जा सकती है।
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उदारवादी
चिंतक ईश्वर चंद्र विद्यासागर
नैतिक
मूल्यों के संरक्षक शिक्षाविद् विद्यासागर का मानना था कि
अंग्रेजी और संस्कृत भाषा के ज्ञान का समन्वय करके ही भारतीय
और पाश्चात्य परंपराओं के श्रेष्ठ को हासिल किया जा सकता
है। उन्होंने देशी भाषा (वर्नाक्युलर एजुकेशन) और लड़कियों
की शिक्षा के लिए स्कूलों की एक श्रृंखला के साथ ही कलकत्ता
में मेट्रोपॉलिटन कॉलेज की स्थापना भी की।
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हादसों
भरा सफर...
अगर
लगभग तीन दशक पहले की बात की जाए तो उन दिनों भारत में लगभग
50 लाख कारें हुआ करती थीं, जिनकी संख्या अब लगभग 7.5 करोड़
पहुंच गई है। इसी को देखते हुए सड़क हादसों के बढ़ने की
बात कही गई थी। एक रिपोर्ट में अनुमान भी लगाया गया था कि
सड़क दुर्घटनाओं में 8 फीसदी सालाना की हिसाब से वृद्धि
हो रही है, ऐसे में सड़क हादसों के 2015 तक 2,00,000 सालाना
तक पहुंचने की बात कही गई थी।
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बड़ों
की छोटी हरकतें...
इटली
के प्रधानमंत्री सिल्वियो बर्लुस्कोनी, गोल्फ खिलाड़ी टाइगर
वुड और भारतीय राजनीतिज्ञ नारायण दत्त तिवारी में एक असम्मानजनक
समानता है. तीनों नाम अलग-अलग देशों और अपने-अपने क्षेत्र
के दिग्गजों के हैं। लेकिन अगर इन लोगों के कृत्यों पर नजर
डालें तो काफी हद तक समानता नजर आती है। बात यहीं खत्म नहीं
होती। बिहार के एक मंत्री बालाओं के साथ जश्न मनाते नजर
आते हैं। तिवारी को तो होली के नाम पर एक बार फिर रंगरेलियां
मनाते देखा गया.
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