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शशि थरूर के बयान पर बेवजह हंगामा

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देश में इन दिनों बेवजह बात का बतंगड़ बनाने की एक परंपरा सी चल पड़ी है। किसी भी सुझाव, विचार अथवा प्रस्ताव के अच्छे बुरे पहलुओं पर विचार किए बगैर ही बेवजह उस पर विवाद पैदा कर दिया जाता है। मजे की बात यह है कि इस परंपरा का निर्वहन, केवल सत्तापक्ष द्वारा विपक्ष और विपक्ष द्वारा सत्तापक्ष की खिंचाई के लिए ही नहीं बल्की अपने लोगों की भर्त्सना के दौरान भी बखूबी किया जा रहा है। केंद

हमारी फिल्मों में सताना भी अच्छा माना जाता है और पीछा करना भी

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दिल्ली में पैरामेडिक लड़की पर हुए हमले और बलात्कार के खिलाफ बड़े पैमाने विरोध प्रदर्शन हुए और इस बात की आलोटना भी की गईं कि हम महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार क्यों करते हैं। इस व्यवहार की एक प्रमुख वजह है फिल्म उद्योग जिसका कम ही जिक्र हुआ है। वह बेहद प्रतिगामी पुरूष व्यवहार को जन्म देता है इस कारण आंशिक रूप से दुर्व्यवहार के लिए  जिम्मेदार है।

सियासत की तंगनजरी

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राष्ट्रपति के साहबजादे अभिजीत मुखर्जी का बयान आया, जिसमें उन्होंने इंडिया गेट पर बैठी महिला प्रदर्शनकारियों को इन शब्दों में जलील करने की कोशिश की, ‘मेरी नजरों में ये रंगी हुई (लिपिस्टिक से), घिसी हुई औरतें कॉलेज की छात्राएं बिल्कुल नहीं हो सकतीं।’ यह कह कर वे खुद जलील हुए। लेकिन उनके बयान से कई सवाल पैदा होते हैं, जो मैं अपने आपसे पूछती रही हूं जब से प्रदर्शन शुरू हुए इंडिया

मर्म जानो, धर्म तो समझो बाज़ार का

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यह सच है कि इंसान और समाज, दोनों ही लगातार पूर्णता की तरफ बढ़ते हैं। लेकिन जिस तरह कोई भी इंसान पूर्ण नहीं होता, उसी तरह सामाजिक व्यवस्थाएं भी पूर्ण नहीं होतीं। लोकतंत्र भी पूर्ण नहीं है। मगर अभी तक उससे बेहतर कोई दूसरी व्यवस्था भी नहीं है। यह भी सर्वमान्य सच है कि लोकतंत्र और बाजार में अभिन्न रिश्ता है। लोकतंत्र की तरह बाजार का पूर्ण होना भी महज परिकल्पना है, हकीकत नहीं। लेक

बलात्कार और समाज

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जो कुछ हो रहा है, भयावह है। लग रहा है जैसे सती-युग लौट आया है। चैनल खबर चला रहे हैं- संसद सदमे में। सदमे में तो हम हैं। स्त्री अब क्या करेगी, कैसे जिएगी, कैसे अपना मुंह सबको दिखाएगी- ये कैसे सवाल हैं?

हिन्दी लेखकों की ‘बाजारवाद’ को लेकर गलत समझ

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पिछले कुछ वर्षों में हिंदी साहित्यकार और पत्रकार बडी संख्या में बाजार और एक अस्त्विहीन अवधारणा ‘बाजारवाद’ के खिलाफ लठ लेकर पडे हैं। कहना न होगा कि इन जिहादियों को न तो अर्थशास्त्र का ज्ञान है और न ही इतिहास का। अर्थशास्त्र में ‘बाजारवाद’ नाम की कोई भी अवधारणा नहीं है। अगर विश्वास न हो तो किसी भी प्रामाणिक कोश को देख लें। पालग्रेव के विश्वकोश में भी ढूंढे तो ‘मार्केटिज्म’ शब्द

समाजवाद बीमार विचार है

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मार्क्स के दिमाग में एक बुनियादी रोग था। और वह रोग यह था कि वह चीजों को संघर्ष की भाषा में ही सोच सकता था, सहयोग की भाषा में सोच नहीं सकता था। द्वंद की भाषा (डायलेक्टीक्स) की भाषा में सोच सकता था। वह सारे विकास को कंफ्लिंक्ट की भाषा में सोच सकता था कि सारा विकास द्वंद है। यह पूरी तरह सच नहीं है। निश्चित विकास में द्वंदता एक तत्व है। लेकिन द्वंद विकास का आधार नहीं है, द्वंद से

जल्द खत्म हो देश का नीतिगत लकवा

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मनमोहन सरकार ने खुदरा कारोबार में एफडीआई को अनुमति के मुद्दे पर संसद में बहुमत साबित किया। पर क्या इससे वह विकास और सुधार के मसलों में निकम्मेपन के आरोप से मुक्ति पा सकती है?

मोदी प्रधानमंत्री बने तो सहयोगी दलों की दया पर निर्भर होंगे

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जैसे गुजरात  का चुनाव अभियान अपने चरम पर पहुंचता जा रहा है कई पर्यवेक्षक भाजपा के नरेंद्र मोदी की भारी जीत की भविष्यवाणी कर रहे हैं कुछ तो मानते हैं कि 2007 से भी ज्यादा बड़ी जीत हो सकती है। इससे वह अगले आमचुनाव में पार्टी के प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार बन सकते हैं।

सपने जुदा-जुदा

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इस बार चुनाव प्रचार के दौरान गुजरात न जा सकी। मेरी नई किताब हाल में छपी है और उस सिलसिले में इतनी मशरूफ रही हूं कि चुनाव देखने न जा सकी, बावजूद इसके कि मैं जानती हूं कि यह चुनाव 2014 का रिहर्सल है। न जा पाने की वजह से मैं अपने पत्रकार बंधुओं के लेखों पर निर्भर रही, जिनको पढ़ने के बाद ऐसा लगा कि उन्होंने अब भी 2002 के दंगों के लिए नरेंद्र मोदी को माफ नहीं किया है। उनके लेख अखब