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क्या भारत में प्रासंगिक है थैचर का आर्थिक मॉडल - हां
अप्रैल 15, 2013 - 19:56थैचरिज्म सरकार, बाजार व नागरिक संगठनों की उपयुक्त भूमिका वाले दर्शन पर आधारित था। सरकार को केवल उन्हीं कार्यों को करना चाहिए जो बाजार व नागरिक संगठन प्रभावी ढंग से नहीं कर सकते। और मुक्त प्रतियोगिता बाजार का बेहतर नियामक और उपभोक्ताओं का बेहतर संरक्षक है।
ऊर्जा का जबर्दस्त स्त्रोत बनेगी जलती बर्फ
मार्च 19, 2013 - 17:35जापान की नई पहल के बाद समुद्र तल में पाए जाने वाले गैस हाइड्रेट्स में दुनिया की दिलचस्पी बढ़ गई है
चंद किस्सों के बहाने
मार्च 18, 2013 - 19:05सोशल मीडिया की उपयोगिता के सैकड़ों आयाम हैं। यह उपयोगिता जब किसी को न्याय दिलाने या जीवन बचाने के मामले में दिखाई देती है, तो स्वाभाविक तौर पर इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। ऐसा एक मामला बेंगलूर में दो दिन पहले सामने आया। पुलिस ने फेसबुक के जरिए दो सड़कछाप मवालियों को धर दबोचा। मामले की शुरुआत चंद दिनों पहले हुई थी, जब युवा अक्षय को अपनी दो महिला मित्रों के साथ सड़क पर दो लड
पीड़ा की अनुभूति और नैतिकता
फरवरी 22, 2013 - 17:19जब से मुक्त अर्थव्यवस्था की शुरूआत हुई है पाठकों के कानों पर बार-बार एडम स्मिथ नामक अर्थशास्त्री का नाम बार-बार पड़ने लगा है। मराठी साहित्य में जो स्थान ज्ञानेश्वरी का है वही स्थान अर्थशास्त्र में उनके द्वारा 1776 में लिखी गई पुस्तक `राष्ट्र की संपत्ति`(Wealth of Nations) नामक पुस्तक का है। स्मिथ ने श्रम विभाजन, विशेषज्ञता जैसे प्राथमिक सिद्धांतों से लेकर मूल्य, बाजार,
स्वतंत्रता होने पर ही समता के लिए संघर्ष संभव - ओशो
फरवरी 21, 2013 - 15:25समाजवाद कहता है कि हम समानता लाना चाहते हैं। लेकिन बड़ा मजा यह है कि और इसलिए समाजवाद कहता है कि समानता लाने के पहले स्वतंत्रता छीननी पड़ेगी। तो हम स्वतंत्रता छीनकर सब लोगों को समान कर देंगे। लेकिन ध्यान रहे कि स्वतंत्रता है तो समानता के लिए संघर्ष कर सकते हैं लेकिन अगर स्वतंत्रता नहीं है तो समानता के लिए संघर्ष करने का कोई उपाय आदमी के पास नहीं रह जाता है।
राजनीति में हैं नई आर्थिक सक्रियता की जड़ें
फरवरी 20, 2013 - 17:04छह महीने पहले सरकार निराशा और पंगुता की शिकार नजर आ रही थी। लगता था कि यह किसी को भी (खासकर ममता बनर्जी को) नाराज करने की हिम्मत कभी नहीं जुटा पाएगी। लेकिन जब से चिदंबरम वित्तमंत्री बने हैं तब से सरकार किसी ऐसे सुधारवादी कार्यकर्ता जैसी लग रही है, जो किसी भी सूरत में अपने लक्ष्य से कम किसी भी चीज पर राजी नहीं होने वाला। संसद में हार का खतरा उठाकर भी मल्टीब्रांड रिटेल का मामला
