पश्चिम बंगाल में ये क्या हौ रहा है...

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पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकार के खिलाफ सड़क से संसद तक संघर्ष करने के दौरान अदम्य साहस व जुझारूपन प्रदर्शित करने के कारण बंगाल की शेरनी जैसे उपनाम से प्रसिद्ध ममता बनर्जी ने अपने राजनैतिक कैरियर में बहुत सारे मील के पत्थर स्थापित किए हैं। अपने समय में सबसे युवा सांसद होने का खिताब प्राप्त करने वाली ममता के बागी तेवर तो खुर्राट सोमनाथ चटर्जी को चुनाव में धूल चटाने के बाद से ही नजर आने लगे थे। केंद्रीय रेलमंत्री के पद पर भी दो कार्यकाल पूरा करने वाली ममता के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल की जनता को बेहतर भविष्य की आस बंधी और उन्होंने मां-माटी-मानुष के नारे को हाथो-हाथ लिया। जनता ने तीन दशक से अधिक समय से राज कर रही वामसरकार को धूल चटाते हुए ममता को सरकार की कमान सौंपी। लोगों को उम्मीद थी कि अब बंगाल विकास की मुख्यधारा में लौट आएगा। लेकिन ममता द्वारा प.बंगाल की मुख्पमंत्री बनने के बाद केंद्र सरकार पर दबाव बना कर पहले अपने स्थान पर दिनेश त्रिवेदी को रेलमंत्री बनाने, बाद में रेल किराये में वृद्धि वापस न लेने पर तमाम आलोचनाओं को नजरअंदाज करते हुए उन्हें पद से हटवाने, बंगाल में पाठ्यपुस्तकों से मार्क्स को हटाने की पहल करने, मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में शामिल न होने, इंटरनेट पर अपने कार्टून को प्रसारित करने वाले जाधवपुर विश्विद्यालय के प्रो. अंबिका महापात्रा को जेल में डलवाने जैसे एक के बाद एक विवादास्पद कदम उठाने से क्या उनकी लोकप्रियता घट रही है? क्या वास्तव में ममता तानाशाहों जैसा बर्ताव कर रहीं हैं? क्या उनका यह रवैया लोकतंत्र के लिए घातक साबित हो रहा है? क्या ममता के फैसलों से सत्ता के मद में विरोध को कुचलने की नई परिपाटी शुरू होने की संभावना बन गई है?

- अविनाश चंद्र