आजीविका के लिए अवरोध दूर करना

सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी ऐसे नियामक अवरोधों को दूर करने के लिए काम करता है जिनसे अनौपचारिक क्षेत्र में विकास और उद्यमी अवसर सीमित हो जाते हैं। अपने पुरस्कार प्राप्त ''कानून, स्वतन्त्रता और आजीविका'' अभियान के माधयम से यह केन्द्र अपना ध्यान इस बात पर केन्द्रित करता है ताकि परमिट प्रक्रियाओं को घटाया और सरल बनाया जाए जिनसे छोटे उद्यमियों, दुकानदारों, फेरी वालों और रिक्शा चलाने वालों को अपने व्यवसाय को स्थापित करने और आगे बढ़ाने से रोका जाता है। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी अपने प्रवर्तक और स्थापक कार्यक्रम जैसे जीविका, ऐशिया आजीविका प्रलेखी वार्षिक त्यौहार के माधयम से छोटे उद्यमियों को पेश आने वाली बाधाओं के प्रति जागरूकता का निर्माण कर रहा है|

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लॉबिंगः हंगामा है क्यों बरपा?

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जब से भारतीयों विशेषकर खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश का विरोध कर रही राजनैतिक पार्टियों को पता चला है कि वालमार्ट ने भारत में एफडीआई को मंजूरी देने के प्रति सहमति कायम कराने के लिए ‘लॉबिंग’ के मद में सवा सौ करोड़ रूपए की भारी भरकम धनराशि खर्च की है, उनकी भृकुटि तन गई है। एफडीआई के मुद्दे पर लोकसभा में वोटिंग के दौरान हुई हार से तिलमिलाए राजनैतिक दलों को जैसे

प्रतिबंध समस्या का समाधान नहीं समस्या को बढ़ाने वाला कारक है (अंतिम भाग)

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प्रतिबंध को समस्या का एकमात्र समाधान मानने के दुष्परिणाम के रूप में राजधानी दिल्ली में प्लास्टिक व गुटखे पर लगी पाबंदी के बावजूद खुले आम बिक्री, प्रयोग और सेवन के तौर पर देखा जा सकता है। गुटखे पर लगे प्रतिबंध के लगभग तीन माह और प्लास्टिक पर प्रतिबंध को एक माह बीत जाने के बावजूद दिल्ली का कोई भी इलाका ऐसा नहीं है जहां प्लास्टिक बैग व गुटखों की उपलब्धता व प्रयोग खुलेआम न दिखता

प्रतिबंध समस्या का समाधान नहीं समस्या को बढ़ाने वाला कारक है (भाग दो)

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उदाहरण के लिए चीनी व्स्तुओं पर प्रतिबंध उनकी घटिया गुणवत्ता व इसके अर्थव्यवस्था व स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को रोकने के लिए लगाया गया है। लेकिन भारतीय बाजार चीनी वस्तुओं से भरे पड़े हैं और खिलौनों आदि में प्रयुक्त रंग के संपर्क में आने के कारण बच्चों को कैंसर, दिल व फेफड़े की बीमारी हो रही है। क्या ही अच्छा होता कि चीनी वस्तुओं के लिए भारतीय बाजार खोल दिए जाए लेकिन इ

उपभोक्ताओं के हित में निवेश

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जब भी दिल्ली में आम उपभोक्ता सब्जियों की महंगाई को लेकर हायतौबा मचाते हैं तो अक्सर सरकार राजधानी की सबसे बड़ी थोक मंडी आजादपुर में खरीदी जाने वाली सब्जियों के थोक भावों का विज्ञापन छपवाती है। पिछले कई सालों से इन विज्ञापनों को जिन्होंने भी देखा है, वे जानते हैं कि इनसे साफ पता चलता है कि आज तक किसान को कभी भी पालक के लिए 10 रुपये किलो का रेट नहीं मिला। बथुआ, गोभी कभी भी सीजन

भेड़िया जो कभी आया ही नहीं

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खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर बहस अंततः समाप्त हो गई। उम्मीद है कि अब इसने उन अन्य गरमागरम बहसों की आत्माओं के बीच अपनी शांतिपूर्ण जगह बना ली होगी, जिनसे हमारा लोकतांत्रिक देश यदा कदा गुजरता रहता है। हर समय लगता है मानो यह हमारे जीवन मरण का मुद्दा हो और हम विनाश के कगार पर खड़ें हों। अगर आप उनमें से हैं, जो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के विरोधियों द्वारा की गई बर्बादी की भवि

फेरीवाले कारोबार से क्यों इन्कार

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देश के तमाम शहरों की सड़कें न सिर्फ लाखों कामगार गरीबों तथा अभावग्रस्त लोगों की आश्रयस्थली वरन उनकी रोजीरोटी का केंद्र भी हैं, जहां पर वे सस्ते और आकर्षक सामानों की दुकान सजाते हैं। शहरों में सड़क किनारे फुटपाथ पर आपकों ऐसे अनेक पुरष-महिलाएं पकाया हुआ भोजन, फल व सब्जियां, कपड़े, खिलौने, किताबें, घरेलू इस्तेमाल की चीजें व सजावटी सामान बेचते मिल जाएंगे। एक अनुमान के मुताबिक भार

दुकानदारों ने कहा, खुदरा बाजार में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आने से नहीं पड़ेगा फर्क

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विपक्षी दलों ने गुरूवार को खुदरा व्यवसाय में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मुद्दे पर किसी प्रकार ‘बंद’ कराने में तो सफल रहें लेकिन छोटे दुकानदारों, जिनके हितों की रक्षा के नाम पर यह सब हुआ वे ही बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उनके व्यवसाय पर कथित हमले का आशंका से अविचलित दिखें। टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में किराना दुकान संचालकों ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि वे बेरोजगार हो जाएंगे।

बांस को मुक्त करने के लिए नौकरशाही और जारी व्यवस्था की बाधा हटे

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बांस के पेड़ की बजाए घास होने के तथ्य के वैज्ञानिक तौर पर प्रमाणित और संवैधानिक तौर पर स्वीकृत हो जाने के बावजूद नौकरशाही और पहले से जारी व्यवस्था के कारण अब तक इसे घास के रूप वैधानिक मान्यता नहीं मिल सकी है। जिसके कारण इसकी कटाई और व्यवसायिक प्रयोग की मनाही है। यदि इसे घास के रूप में पर्यावरण और वन मंत्रालय से वैधानिक मान्यता मिल जाती है तो देश में न केवल हरे वृक्षों की कटाई

आजीविका के लिए जद्दोजहद पर आधारित फिल्मों की प्रदर्शनी 31 से

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जीविका एशिया लाईवलीहुड डॉक्यूमेंटरी फिल्म फेस्टीवल 2012 में शिरकरत करेंगे बालीवुड के ‘शो मैन’ सुभाष घई; इंडिया हैबिटेट सेंटर में 2 सितंबर तक चलने वाले फिल्म फेस्टिवल के दौरान 18 डाक्यूमेंटरी फिल्मों का होगा प्रदर्शन

आम नहीं, खास हुनर है रिक्शा-टैक्सी चलाना

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रिक्शा-टैक्सी चालकों को शहर की यातायात व्यवस्था के लिए परेशानी का सबब मान नए-नए नियम बना उन्हें नियंत्रित करने और इस क्रम में परिवहन व्यवस्था व चालकों की रोजी रोटी दोनों के साथ खिलवाड़ करने वाले टाऊन प्लानर्स व नीति-निर्धारकों को नासिक के यशवंतराव चाह्वाण ओपन यूनिवर्सिटी से सबक लेनी चाहिए। यूनिवर्सिटी के मुताबिक यह काम आम नहीं बेहद खास है और इसके लिए विशेष हुनर होना आवश्यक है