आजीविका के लिए अवरोध दूर करना

सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी ऐसे नियामक अवरोधों को दूर करने के लिए काम करता है जिनसे अनौपचारिक क्षेत्र में विकास और उद्यमी अवसर सीमित हो जाते हैं। अपने पुरस्कार प्राप्त ''कानून, स्वतन्त्रता और आजीविका'' अभियान के माधयम से यह केन्द्र अपना ध्यान इस बात पर केन्द्रित करता है ताकि परमिट प्रक्रियाओं को घटाया और सरल बनाया जाए जिनसे छोटे उद्यमियों, दुकानदारों, फेरी वालों और रिक्शा चलाने वालों को अपने व्यवसाय को स्थापित करने और आगे बढ़ाने से रोका जाता है। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी अपने प्रवर्तक और स्थापक कार्यक्रम जैसे जीविका, ऐशिया आजीविका प्रलेखी वार्षिक त्यौहार के माधयम से छोटे उद्यमियों को पेश आने वाली बाधाओं के प्रति जागरूकता का निर्माण कर रहा है|

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मजदूरी आर्थिक वृद्धि से बढ़ी है, मनरेगा से नहीं

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पिछले छह वर्षों में खेत मजदूरों की मजदूरी काफी तेजी से बढ़ी है और इसके बढ़ने की रफ्तार चीजों की कीमतें बढ़ने की रफ्तार से ज्यादा रही है। इसका नतीजा ग्रामीण मजदूरों का जीवन स्तर सुधरने रूप में दिखाई पड़ा है। 2007-08 से लेकर अबतक देश के इस सर्वाधिक विपन्न तबके की आय में 6.8 प्रतिशत की वास्तविक सालाना बढ़त दर्ज की गई है। इस शानदार रुझान के पीछे क्या है?

नियम नहीं नीयत की जरूरतः जेपी अग्रवाल

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- अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के दिन रेहड़ी-पटरी व फेरी वालों के लिए मित्रवत व सुविधाजनक कानून बनाने की मांग पर बोले कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष

अपने हितों के लिए भारत सरकार भी करती है विदेशों में लॉबिंगः डॉ. आलोक पुराणिक

डा. आलोक पुराणिक

खुदरा व्यापार में 51 फीसदी विदेशी निवेश के मुद्दे पर ‘संसद से सड़क तक’ घमासान छिड़ने और काफी जद्दोजहद के बाद नियम 184 के तहत संसद में बहस और वोटिंग के बाद विदेशी खिलाड़ियों के लिए देश में रिटेल स्टोर खोलने का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि विदेशी निवेश के नफा-नुकसान को लेकर लोगों के मन में अब भी संशय बना हुआ है। उधर, वॉलमार्ट द्वारा भारत में व

माफ करें, हमारा मुल्क बिकाऊ नहीं है

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क्या आपने संसद के दोनों सदनों में इस हफ्ते किराना में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मुद्दे पर हुई बहस टेलीविजन पर देखी? यदि नहीं, तो कृपया लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही जरूर पढ़िए। आप पाएंगे कि हमारे नेताओं के शब्द खोखले हो गए हैं और विचार भोथरे। न उनके विरोध का कोई अर्थ है और न समर्थन पर कोई सार्थक तर्क.

लॉबिंगः हंगामा है क्यों बरपा?

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जब से भारतीयों विशेषकर खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश का विरोध कर रही राजनैतिक पार्टियों को पता चला है कि वालमार्ट ने भारत में एफडीआई को मंजूरी देने के प्रति सहमति कायम कराने के लिए ‘लॉबिंग’ के मद में सवा सौ करोड़ रूपए की भारी भरकम धनराशि खर्च की है, उनकी भृकुटि तन गई है। एफडीआई के मुद्दे पर लोकसभा में वोटिंग के दौरान हुई हार से तिलमिलाए राजनैतिक दलों को जैसे