भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।
नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।
केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।
अधिक जानकारी के लिये देखें : http://ccs.in/governance.asp
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वित्त मंत्री जी कारवां क्यों लुटा?
मई 24, 2013 - 19:28पी चिदंबरम साहब से एक सवाल पूछने का मौका मिलता मुझे, तो मेरा उनसे यह सवाल होता- भारत का कारवां क्यों लुटा? यह सवाल मैंने चुराया है एक मशहूर शेर से, जो कुछ इस तरह है, तू इधर-उधर की न बात कर, यह बता कारवां क्यों लुटा?
दुनिया में गरीबी का आखिरी गढ़
मई 10, 2013 - 15:53पिछले सप्ताह विश्व बैंक ने विश्व में गरीबी की स्थिति पर एक रिपोर्ट जारी की। मनुष्य होने के नाते इस दस्तावेज को पढ़ना आनंददायी रहा, क्योंकि इससे पता लगता है कि कितनी तेजी से हर जगह भीषण गरीबी कम हो रही है। लेकिन, भारत के नागरिक के रूप में रिपोर्ट को पढ़ना निराशाजनक रहा। इसके कारणों पर हम आगे चर्चा करेंगे। पहले अच्छी खबर पर
सीबीआई को गुलामी से मुक्त किया जाए
मई 8, 2013 - 17:37
उच्चस्तरीय भ्रष्टाचार को रोकने के लिए देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी में सरकार की दखलंदाजी रोकने की जरूरत।
खाद्यान्न खरीद का औचित्य (भाग दो)
अप्रैल 22, 2013 - 16:57
अन्य क्षेत्रों की तरह यहां भी चीनी सरकार ने बाजी मार ली है। 1960 का आयातक चीन आज तमाम देशों को गेहूं निर्यात करता है। वहां की सरकार ने एक अलग तरह का दोहरा मॉडल अपनाया है। विश्व में सर्वाधिक आबादी वाले इस देश में किसानों को पर्याप्त सब्सिडी दी जाती है, पर बाजार खुला है।
गुजरात में शराब बंदी का औचित्य
अप्रैल 12, 2013 - 17:18
हम भारतीय असहज मुद्दों से बचने में उस्ताद हैं। असहज मामलों पर चर्चा करने के बजाय हम ढोंगी और झूठा बनना ज्यादा पसंद करते हैं। ऐसा ही एक मुद्दा है शराब के सेवन का, जिस पर चर्चा से परहेज करना हम अच्छी तरह सीख चुके हैं। हमसे उम्मीद की जाती है कि हम शराब से संबंधित हर चीज की सार्वजनिक रूप से आलोचना करेंगे।
कुछ अंधेरे पहलू
मार्च 25, 2013 - 17:36शिशु मृत्यु दर और अपेक्षित आयु के मामले में बिहार राष्ट्रीय औसत से पीछे ही रहा करता था, लेकिन अभी वह दोनों मामलों में इसके काफी करीब पहुंच गया है। 47 प्रति हजार के आंकड़े के साथ फिलहाल बिहार शिशु मृत्यु दर के मामले में भारतीय औसत (48 प्रति हजार) से थोड़ा बेहतर स्थिति में है, जबकि 65.6 वर्ष की अपेक्षित आयु के साथ वह करीब-करीब भारतीय औसत (66.1 वर्ष) की बराबरी पर है। कुल मृत्यु
