सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

अधिक जानकारी के लिये देखें : http://ccs.in/governance.asp

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ड्राइविंग लाइसेंसः निजीकरण की दरकार

यूरोप और अमेरिका में सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या कम होती जा रही है, भारत में यह बढ़ रही है

लेखक : 
अरविंद काला
प्रकाशित: 
Live Mint - Sep 12, 2007

समाजिक बदलाव के लिए अरुणा राय का समाधान

भारत को ऐसे थिंक टैंकों की जरूरत है, जो असरकारी, कम खर्चीले और टिकाऊ नीतिगत समाधानों की खोज कर सके. -पार्थ जे शाह

लेखक : 
पार्थ जे शाह

निजी संपत्ति अधिकारों की सामाजिक भूमिका

निजी संपत्ति अधिकार एक व्यक्ति का वो अधिकार है जिससे वह जैसे भी चाहे अपनी संपत्ति का इस्तेमाल कर सकता है, बशर्ते वह दूसरे व्यक्ति के खिलाफ धोखाधड़ी या बल का प्रयोग न करे। संपत्ति अधिकार के महत्व पर जोर देने वाले पहले अर्थशास्त्री आस्ट्रिया के कार्ल मैगर थे। 1971 में एक लेख में मैगर ने यह कहा कि अधिकतर सामान की उपलब्ध मात्रा प्रत्येक व्यक्ति की जरूरतों को पूरा करने के

लेखक : 
ज्यां स्माइले
प्रकाशित: 
द फ्रीमैन: आइडियाज ऑन लिबर्टा मई 1990

पुराने वित्तीय अनुशासन और लोक सेवाओं के लिए नए तरीके

मुक्त बाजार लोक प्रशासन का उदाहरण: कूडा करकट की सफाई का काम।

लेखक : 
सौविक चक्रवर्ती

सभ्य समाज की ओर

ओलिवर वेंडेल होम्स ने लिखा है कि कराधान वह मूल्य है जिसे हम अपनी सभ्यता के लिए चुकाते हैं। लेकिन इसे यदि इस तरह से व्यक्त किया जाए कि कर

लेखक : 
लॉरेंस डब्ल्यू रीड
प्रकाशित: 
व्यू प्वाईंट ऑन पब्लिक इशयुज (8-जुलाई-1996)

सरकारी दखलंदाजी से किराया हुआ महंगा

    यूँ तो अपना मकान हर किसी का सपना होता है। पर अपना मकान होने तक का सफर अधिकतर लोगों को किराये के मकान में रह कर ही तय करना पड़ता है। ऐसे में हर किसी को एक सस्ते मकान की तलाश रहती है। पर आलम यह है कि दिल्ली ही नहीं किसी भी महानगर में आज मकान किराये की दर आसमान छू रही है। परिणाम यह होता है कि अपने मकान का सपना साकार करने का सफर कुछ और ज्यादा लंबा हो ज

लेखक : 
संजय कुमार साह
प्रकाशित: 
इकोनॉमी इंडिया (जून/जुलाई 2006)

बुद्धू न बनो बुद्धदेव

    कई दिनों से पश्चिम बंगाल का सिंगूर और नंदीग्राम राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में छाया रहा। सिंगूर में ममता अनशन पर बैठी रहीं, पर राज्य सरकार को ममता नहीं आई। लेकिन नंदीग्राम में बुद्धदेव जी ने अपनी भूल स्वीकार कर ही ली। वे मान रहे हैं कि वहाँ स्थानीय प्रशासन स्तर पर भारी भूल हुई है। वो भूल क्या थी, स्पष्ट नहीं किया गया। कुछ साफ पता चले तो उसके नि

लेखक : 
संजय कुमार साह
प्रकाशित: 
इकोनॉमी इंडिया (मार्च 2007)

हवाई अड्डे का जनप्रतिकूल प्रबंधन: कब होगा यहाँ आर्थिक सुधार?

    उदारीकरण और निजीकरण का नुस्खा हवाई यात्रा क्षेत्र में थोड़ा सुधार लाने में तो जरूर सफल हुआ है, पर हवाई अड्डा के विकास के दौर में पीछे छूट जाने के कारण न सिर्फ यात्रियों को घोर असुविधाओं का सामना करना पड़ता है, बल्कि यह नागरिक उड्डयन क्षेत्र को भी तेजी से विकास करने से रोक रहा है। देश में हवाई अड्डे का प्रबंधन कितना खराब चल रहा है, उसे राजीव की बातें

लेखक : 
संजय कुमार साह
प्रकाशित: 
(2 जनवरी 2007)

जनता का हथियार

    दिल्ली सहित देश के 7 राज्यों में सूचना का अधिकार अधिनियम लागू हो चुका है। इस अधिनियम के अनुसार हर नागरिक को यह अधिकार है कि वह सरकार से उसकी किसी भी गतिविधि, प्रावधान, योजना, आदि से संबंधित कोई सूचना मांग सकता है। प्रशासनिक सुधार की दिशा में यह एक अच्छा कदम है। स्वीडन में पिछले 200 सालों से भी अधिक समय (1776 ई­) से यह अधिनियम लागू है और वहाँ भ

लेखक : 
संजय कुमार साह
प्रकाशित: 
जनसत्ता (12 मार्च, 2004)

असंगठित क्षेत्र की सामाजिक सुरक्षा

    नये कानूनों के निर्माण की खातिर संसद में विचार हेतु जिन विधेयकों को लाए जाने की कोशिश की जा रही है, उनमें से एक असंगठित क्षेत्र मजदूर विधेयक भी है। इस विधेयक की रूपरेखा असंगठित मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तैयार की गई है। अभी तक मजदूरों के कल्याण के लिए जो कानून अस्तित्व में हैं, वह काफी नहीं है। उनकी परिधि में सामान्यत:

लेखक : 
संजय कुमार साह
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इकोनॉमी इंडिया (नवंबर, 2005)