आपदा प्रबंधन विभाग : पर उपदेश कुशल बहुतेरे
बचपन में हम सबने अज्ञानी नाविक व महाज्ञानी पंडित की कहानी अवश्य पढ़ी-सुनी होंगी। कहानी का मजमून कुछ यूं है कि एक महाज्ञानी पंडित जिन्हें अपने ज्ञान पर बड़ा घमंड था, यात्रा पर निकले। रास्ते में एक नदी पड़ी जिसे पार करने के लिए उन्हें नाव की जरूरत पड़ी। नाविक से किराया आदि तय करने के बाद वह नाव पर सवार हुए। नाव अभी कुछ ही दूर बढ़ी कि महाज्ञानी पंडित के ज्ञान ने हिलोरे मारना शुरू किया। उन्होंने नाविक से पूछा कि क्या वह उनकी पुस्तक में लिखे मंत्रों को पढ़ सकता है? नाविक द्वारा यह बताने पर कि वह पढ़ तो नहीं सकता लेकिन मंत्र व उसका अर्थ उसे कंठस्थ है, पंडित ने नाविक की ओर हीन दृष्टि से देखा। इसके बाद पंडित ने नाविक के शास्त्र ज्ञान के बाबत सवाल किया। नाविक ने बताया कि उसने शास्त्र नहीं पढ़े लेकिन उसे शास्त्रों में वर्णित बातों का व्यवहारिक ज्ञान है। नाविक द्वारा दोनों उत्तर नकारात्मक में देने पर पंडित ने कहा कि चूंकि वह अशिक्षित है इसलिए उसका आधा जीवन व्यर्थ हो गया।
थोड़ी ही देर बाद नदी में लहरें उठने लगीं और नाव हिचकोले खाने लगी। तब नाविक ने पंडित से पूछा हे महाज्ञानी,क्या आपको तैरना आता है? इस पर पंडित ने कहा कि उसने तैरने के बारे में बस किताबों में ही पढ़ा है और उसे व्यवहारिक ज्ञान नहीं है। नाविक ने हंसते हुए नदी में छलांग लगा दी और तैरते हुए कहा कि यदि आपको तैरने का व्यवहारिक ज्ञान नहीं है तो आपका पूरा जीवन व्यर्थ है। पंडित नाव के साथ उफनती नदी में समा गया और जीवन से हाथ धो बैठा। व्यवहारिक शिक्षा की महत्ता को रेखांकित करती यह कहानी सबक देती है कि पुस्तकीय ज्ञान के साथ ही साथ व्यवहारिक ज्ञान का होना अत्यंत आवश्यक है। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि केंद्र व प्रदेश सरकार के विभागों ने न केवल उस कहानी को भुला दिया गया है बल्कि उसकी सीख को भी विस्मृत कर दिया है। परिणाम स्वरूप किताबी ज्ञान से युक्त मंत्रियों-अधिकारियों द्वारा आए दिन ऐसे ऐसे तुगलकी फरमान जारी किये जाते और व्यवहार में जाते हैं जो न केवल अव्यवहारिक होते हैं बल्कि जानमाल की हानि का सबब भी बनते हैं।
ताजा घटनाक्रम में यह कहानी दिल्ली आपदा प्रबंधन विभाग पर बिल्कुल सटीक बैठती है। दिल्ली में भवन निर्माताओंव अन्य लोगों के लिए आपदा प्रबंधन के नाम पर तमाम खानापूर्ति कराने के लिए विभाग के आगे पीछे चक्कर काटना पड़ता है। आग अथवा भूकंप से बचने के लिए तमाम कागजी जतन किए जाते हैं लेकिन दुर्भाग्य से राजधानी मेंजब भी कभी ऐसी घटना होती है न केवल विभागीय रणनीति फेल होती है, सारे जतन भी बेकार साबित होते हैं।
हास्यास्पद यह है कि राजधानी वासियों को आपदा से बचाने के लिए गठित आपदा प्रबंधन विभाग जब स्वयं ऐसी परिस्थित से दो चार हुआ तो विज्ञापन व अन्य जागरूकता कार्यकर्मों की सहायता से दूसरों को शिक्षित करने वाला ही भाग चारो खाने चित्त हो गया। गत शुक्रवार, आपदा प्रबंधन विभाग के आईटीओ स्थित भवन में आग लग गई। आगका कारण भले ही कुछ भी हो, इसकी चपेट में आकर पूरा कार्यालय स्वाहा हो गया। और तो और भवन में स्थित अन्य विभागों के कार्यालयों को भी खासा नुकसान पहुंचा। मजे की बात तो यह है कि फायर बिग्रेड की 20 गाड़ियों के तत्काल मौके पर पहुंच जाने के बाद भी आग पर काबू पाने में एक घंटे से ज्यादा का वक्त लग गया। वह भी तब जब आपदा प्रबंधन विभाग के लगभग सभी अधिकारी उच्च शिक्षा से युक्त आपदा प्रबंधन विषय में एमबीए सहिततमाम पाठ्यक्रमों के विशेषज्ञ हैं। कइयों के पास तो देश विदेश के प्रतिष्ठित संस्थानों से अर्जित की गयी एक से अधिक डिग्रियां भी हैं।
आपदा प्रबंधन विभाग में आग आपदा प्रबंधन विभाग का दायित्व आग या भूकंप जैसी आपदा से बचाव के प्रति लोगों को जागरूक करना और ऐसी स्थिति पैदा होने पर राहत एवं बचाव कार्य को अंजाम देने में महत्वपूर्ण भूमिका कानिर्वहन करना है, ऐसे में खुद इस विभाग के कार्यालय में आग लगना और तमाम दस्तावेजों समेत सारे सामान काराख हो जाना निश्चित ही दुर्भाग्यपूर्ण है। दिल्ली में आइटीओ पर विकास भवन में स्थित आपदा प्रबंधन विभाग के कार्यालय में शुक्रवार को शॉर्ट सर्किट के कारण अचानक आग लग गई। आग इतनी तेज थी कि उसपर नियंत्रण करने मेंअग्निशमन विभाग की 20 गाडि़यों को करीब एक घंटे का समय लगा। आग में विभाग के सामान के साथ उसी तलपर स्थित कई अन्य सरकारी विभागों के रिकॉर्ड व सामान भी जलकर राख हो गए।
इस भयावह हादसे में कोई हताहत अवश्य नहीं हुआ, लेकिन सामान को बचाने में विफलता निश्चित तौर पर विभागकी लापरवाह कार्यप्रणाली की ओर इशारा करती है। दूसरों को आग व भूकंप जैसी आपदाओं से बचने का पाठ पढ़ाने वाले आपदा प्रबंधन विभाग के कार्यालय में आग लगना अवश्य बड़ी बात नहीं है लेकिन आग पर काबू पाने में देरी होना और इस कारण सारा सामान नष्ट हो जाना यकीनन चिंता पैदा करता है। यह कहा जा सकता है कि जो विभागअपने कार्यालय की संपत्ति को बचाने में अक्षम है, वह ऐसी किसी आपदा के समय दिल्ली की किसी अन्य इमारत व दिल्ली के लोगों को कैसे सुरक्षा मुहैया करा पाएगा। विभाग के कार्यालय में दस्तावेजों व सामान को आग से बचानेके पुख्ता इंतजाम होने चाहिए थे। यही नहीं, आग बुझाने में इतना समय भी नहीं लगना चाहिए था कि सामान कोबचाया ही नहीं जा सका। विभाग को इस हादसे से सबक लेना चाहिए और खुद को इस तरह तैयार करना चाहिए किभविष्य में ऐसी स्थिति का सामना न करना पड़े।
दिल्ली देश की राजधानी है, यहां कई महत्वपूर्ण इमारतें होने के साथ ही विभिन्न देशों के दूतावास तथा विभिन्न विभागों के केंद्रीय कार्यालय भी हैं। ऐसे में यह आवश्यक है कि किसी आपदा के समय लोगों की सुरक्षा करने के साथ ही इमारतों व उनमें रखे सामान को भी कम से कम क्षति पहुंचे। इसके लिए विभाग को हमेशा सतर्कता के उच्चतमस्तर पर रहना चाहिए, ताकि किसी आपदा की स्थिति में तत्परता से कार्य कर नुकसान को न्यूनतम स्तर पर रोका जा सके।
- अविनाश चंद्र
- Login to post comments
-



