उत्कृष्ट शिक्षा के माधयम से पहुंच में सुधार

सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की अति महत्वपूर्ण परियोजना का नाम स्कूल चयन अभियान है और इसे वर्ष 2007 में आरंभ किया गया था। यह ऐसा अभियान है जिसमें वर्तमान भारत के स्कूली शिक्षा पध्दति में बहुत ही जरूरी सुधार किए जाएंगे और इसके लिए शिक्षा प्रमाणकों, नियामक सुधारों और प्रोत्साहक शिक्षा जिज्ञासुओं की त्रि-भुजा पहुंच का प्रयोग किया जाएगा।

40 प्रतिशत भारतवासी अशिक्षित हैं, और सरकारी स्कूल भारत के बच्चों की जरूरतों पर खरे नहीं उतरते। नागरिक समाज केन्द्र गुण सुधार, विशेषकर गरीबों के लिए शिक्षा की पहुंच पर प्रकाश डालता है। नीति निर्धारकों, शिक्षा विशेषज्ञों और आम कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर स्कूली चयन अभियान हमारा ध्यान दाखिले के अवरोधों को हटाने और शिक्षा प्राप्त करने वालों को प्रोत्साहित में केन्द्रित करता है और स्कूलों और कॉलेजों को लाभप्रद बनाते हुए विधि और विस्तार की गुंजाइश और शिक्षा प्रमाणकों के माधयम से प्रतिस्पर्धाओं की ओर आगे बढ़ता है।

अधिक जानकारी के लिये देखें: स्कूल चयन अभियान

इस पेज पर विभिन्न लेखकों के शिक्षा पर लिखे गये लेख दिये गये हैं। पुरा लेख पढ़ने के लिये उसके शीर्षक पर क्लिक करें।आप लेख पर अपनी टिप्पणीयां भी भेज सकते हैं।

आरटीई के तहत कमजोर तबके के लिए 25% आरक्षण लागू करना

आदर्श नियमों में इस बात को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है कि आखिर निजी स्कूलों में 25 फीसदी आरक्षण को किस तरह से लागू किया जाएगा। शिक्षा के अधिकार अधिनियम को कारगर बनाने के लिए जरुरी है कि कुछ महत्वपूर्ण सवालों के व्यवस्थित तरीके से विस्तृत जवाब दिए जाएं-

लेखक: 
सीसीएस
प्रकाशित: 
मार्च 2010

बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के तहत आदर्श नियमः सीसीएस विधायी विश्लेषण 4

शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम 2009 दरअसल 86वें संवैधानिक संशोधन के तहत मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के सार्वभौमिक अधिकार को सुनिश्चित करने की ही एक वैधानिक कोशिश है। इसके मुख्य बिंदु हैं-

लेखक: 
सी सी एस
प्रकाशित: 
मार्च 2010

शिक्षा को रोजगारपरक नहीं, रोजगार का जरिया बनाएँ

पढ़े-लिखे बेरोजगारों की विशाल फौज को देखकर लोग अनायास ही कह देते हैं कि शिक्षा को 'रोजगार परक' बनाया जाना चाहिए। उनका तात्पर्य यह होता है कि जिन क्षेत्रों में रोजगार की अधिक संभावाएँ हैं, उनसे संबंधित शिक्षा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। देश के अधिकांश महाविद्यालयों में शिक्षा के नाम पर भाषा, साहित्य, इतिहास, राजनीति, समाजशास्त्र, विज्ञान, आदि विषय ही पढ़ाए जाते ह

लेखक: 
संजय कुमार साह
प्रकाशित: 
मानवाधिकार टाइम्स (18-24 मार्च, 2007)

निजी स्कूलों की मोनोपॉली समाप्त कीजिए

गरीबों को भी पढ़ाना है। समाज में आगे बढ़ाना है। इस बात पर शायद ही किसी को ऐतराज हो। सरकार, न्यायालय, मीडिया और सामाजिककर्मी सब इस राय से सहमत हैं तथा अपने-अपने स्तर से इसके लिए प्रयास कर रहे हैं। पर दिल्ली के अनएडेड प्राइवेट सकूलों को शायद यह मंजूर नहीं। इसलिए सरकार से सब्सिडाइज्ड दर पर जमीन लेने तथा उसके लिए गरीबों को 20 प्रतिशत आरक्षण देने की अनिवार्य शर्त के प्रावध

लेखक: 
संजय कुमार साह
प्रकाशित: 
(6 जून 2007)

क्या पढ़ाएँ? क्या नहीं?

अगले साल से लागू होने वाली एनसीईआरटी की नयी प्रस्तावित किताबें बहस के घेरे में हैं। बहस होनी भी चाहिए। बहस रूपी आग में तपकर ही तो पाठयक्रम समाज के सभी पक्षों की उम्मीद पर खड़ा उतरने लायक बनेगा! लोकतंत्र की यही तो आत्मा है!

लेखक: 
संजय कुमार साह
प्रकाशित: 
इकोनॉमी इंडिया (अक्टूबर 2006)

खुशबू की आत्महत्या: हत्यारी शिक्षा व्यवस्था

शिक्षा व्यवस्था का दायरा इतना व्यापक हो, जिसमें प्रेमचंद की भाषा-साहित्य की प्रतिभा को भी निखरने का मौका मिले तो, रामानुजम की गणितीय प्रतिभा को भी पूरा प्रोत्साहन मिले। सचिन-सानिया की खेल प्रतिभा को भी प्रोत्साहन मिले, तो बुधिया की दौड़ने की क्षमता को भी पूरा सम्मान मिले।

लेखक: 
संजय कुमार साह
प्रकाशित: 
मानवाधिकार टाइम्स (17 दिसंबर 2006)

गैरमान्यता प्राप्त स्कूलों को क्यों करें बंद

    आजकल जनहित के मुद्दों पर अदालत के काफी आदेश आ रहे हैं। दिल्ली हाईकोर्ट का नया आदेश है कि 'गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों को निश्चित रूप से बंद करना होगा, अगर यहां पर स्कूल चलाने की शर्तों का पालन नहीं हो रहा हो'। कोर्ट ने कहा है कि इस प्रकार के स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा के इंतजामात काफी मायने रखते हैं। दरअसल अधिवक्ता अशोक अग्रवाल ने वर्ष 2005 में

लेखक: 
संजय कुमार साह
प्रकाशित: 
वीर प्रताप, जालंधर (17 फरवरी 2007)

वाउचर प्रणाली के जरिए शिक्षा की रकम लोगों को सीधे मिले

भारत में शिक्षा के लिए संसाधन जुटाने की तमाम कोशिशें हो रही हैं। शिक्षा उपकर से लेकर न जाने क्या-क्या? पर हकीकत ये है कि सरकार जो पैसे खर्च करती हैं, उसका भारी दुरुपयोग होता है। क्यों न शिक्षा के लिए आवंटित पैसे सीधे-सीधे छात्रों को वाउचर के रूप में दे दिया जाए - पेश है इस पर एक पड़ताल।

लेखक: 
संजय कुमार साह
प्रकाशित: 
इकोनॉमी इंडिया (मई, 2006)

स्कूलों में अभिभावकों का साक्षात्कार

    शहरों के निजी स्कूलों में अभिभावकों का साक्षात्कार, उस पर होने वाला हंगामा और कोर्ट की फटकार संबंधी बातें आए दिन सामने आती रहती हैं। निश्चित ही यह एक विचारणीय मसला है। इस पर अविलंब रोक लगनी चाहिए। कोर्ट से विद्यालयों को मिली फटकार से यही पता चलता है कि सरकार इस परंपरा पर रोक लगाने की कोशिश कर रही है। पर क्या स्कूल सचमुच अभिभावकों का साक्षात्कार ले

लेखक: 
संजय कुमार साह
प्रकाशित: 
इकोनॉमी इंडिया (नवम्बर 2006)