कामनवेल्थ खेलः सरकारी नाकामी और निजी सेक्टर की जीत
भारत में हाल ही में संपन्न हुए कामनवेल्थ खेलों से हमें फिर ये संकेत मिलता है की जहां सरकार और सरकारी संगठन भ्रष्टाचार, फिजूलखर्ची और अक्षमता में लिप्त है, वहीँ निजी सेक्टर अपनी ही लय में देश में विकास के काम सफलता से निपटाता जा रहा है.
निजी सेक्टर की सफलता का एक हालिया उदाहरण है दिल्ली एअरपोर्ट पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर के टर्मिनल 3 का निर्माण. इस टर्मिनल का कार्य कामनवेल्थ खेलो के शुरू होने से काफी पहले जुलाई में ही पूरा हो चुका था. करीब 5.4 मिलियन वर्ग फीट पर फैला दुनिया का आठवां सबसे बड़ा ये टर्मिनल सालाना 34 मिलियन यात्रियों को संचालित कर सकता है. अभी से अंतर्राष्ट्रीय हब )केंद्र( माने जाने वाले इस टर्मिनल में सात मंजिला पार्किंग व्यवस्था है जो की 4300 कारों को संभाल सकती है. टर्मिनल 3 का निर्माण दिल्ली इंटरनैशनल एअरपोर्ट लिमिटेड (DIAL) नामक एक संकाय ने किया है जिसकी कमान हैदराबाद के GMR के हाथ में है. जर्मनी का फ्रापोर्ट और मलेशिया एअरपोर्ट इस में साझेदार हैं और भारत की एअरपोर्ट ऑथोरिटी का इसमें महज 26 % हिस्सा है.
इसी तरह कंप्यूटर सॉफ्टवेर, छोटे वाहन, मोबाइल फ़ोन आदि कई क्षेत्रों में भारत के निजी सेक्टर ने काफी सफलता अर्जित की है. हालांकि निजी सेक्टर कई बार घोर पूंजीवाद का आरोप झेल चुका है. DIAL पर आरोप था कि उसने टर्मिनल 3 के निर्माण में बजट को पार कर दिया लेकिन कंपनी ने अपनी सफाई में कहा की एअरपोर्ट फ्लोर स्पेस और कई सारे एरोब्रिज बनाने में अनुमान से ज्यादा धन लग गया. अपने निंदकों को पीछे छोड़ते हुए GMR ने बाद में टर्की के इस्तानबुल में एक नए एअरपोर्ट बनाने की बोली भी जीत ली. ये पूँजीवाद नही बल्कि वैश्विक प्रतियोगितात्मकता का प्रमाण था. ये उसी तरह था जिस तरह धीरुभाई अम्बानी ने राजनैतिक जोड़तोड़ के आरोपों का सामना करते हुए एक विश्व स्तरीय कम्पनी की रचना की. शायद भारत के राजनेताओं और अफसरों से लेन देन इतना कठिन होता है कि लोग विश्व स्तर पर किसी भी प्रतियोगिता का सामना करने को तैयार हो जाते हैं.
दूसरी तरफ देखें तो जहां टर्मिनल 3 समय से तैयार हो गया, दिल्ली मेट्रो की वो एअरपोर्ट लाइन जो कामनवेल्थ खेलों के पहले तैयार हो जानी थी वो नहीं हो पायी. सौभाग्य से एक ओवरब्रिज खेलों के पहले ही गिर गया और कहीं पर सीलिंग निकल आई. खेल गाँव की लचर व्यवस्था तो सालों तक याद रखी जायेगी और उन मजदूरों की क्या ही बात करें जिन्हे न्यूनतम वेतन तक नहीं दिया गया. सरकारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता के ऐसे कई उदाहरण हमें खेलों के दौरान प्राप्त हुए.
कामनवेल्थ खेलों की २००८ में चीन में हुए ओलंपिक खेलों से तुलना बड़ी रोचक है. चीन में खेल और दूसरी अन्य सफलताओं का श्रेय मुख्यतः सरकार को जाता है. वहाँ सरकार हर क्षेत्र में पूरी तरह हावी है. यहाँ तक कि वहाँ की निजी कंपनियां भी सरकार द्वारा नियंत्रित रहती हैं. ओलंपिक खेलों से पहले वहाँ झोपड़पट्टियों और अन्य ढांचों को बिना किसी से राय लिए गिरा दिया गया और बाद में कोई हर्जाना भी नहीं प्रदान किया गया. चीन में जहां सफलता सरकार के नेतृत्व में पायी जा रही है वहीँ भारत की सफलता ज़्यादातर निजी सेक्टर की देन है. भारत में हुए आर्थिक सुधार की वजह से निजी सेक्टर पिछले कुछ वर्षों में कई मकाम हासिल कर पाया है पर देश के संपूर्ण विकास में सरकार का बड़ा हाथ रहता है.
कई ऐसे क्षेत्र हैं जैसे कानून व्यवस्था, न्याय, ग्रामीण विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य जहां बिना सरकारी पहल और प्रतिबद्धता के विकास असंभव है. जब तक सरकार अपने कार्य प्रणाली में बदलाव नहीं लाती है, भारत का चीन को पीछे छोड़ पाना मुश्किल है.
--स्वामीनाथन अय्यर
