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अक्सर यह बात सुनने में आती है कि भारतीय छात्र वैश्विक स्तर पर अपनी मेहनत व विषय विशेषज्ञता का लोहा मनवा रहे हैं। अक्सर अंतराष्ट्रीय स्तर के शोध व अध्ययनों में भारतीय व चीनी बच्चों के दुनियां के अन्य बच्चों से अधिक सक्षम बताया जाता है। गाहे-बगाहे दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश माने जाने वाले राष्ट्र अमेरिका के राष्ट्रपति भी अपने बच्चों को भारतीय व चीनी छात्रों से सबक लेने और समान रूप से प्रतिस्पर्धी बनने की अपील करते रहते हैं। ऐसे रिपोर्टों का हवाला देते हुए हमारी सरकारें भी अपना पीठ थपथपाती दिखती हैं। लेकिन व्यवहारिक स्तर पर क्या हमें अपने आसपास ऐसा देखने को मिलता है। आखिर...
आजकल मशहूर कार्टूनिस्ट शंकर का बनाया डा़ अंबेडकर का कार्टून चर्चा में है लेकिन शंकर के कार्टून तो हमेशा नेताओं को अपना निशाना बनाते रहे हैं य़यहां पेश हैं उनके कुछ प्रमुख कार्टून
सामंतवाद
आपके पास दो गायें हैं और उनका कुछ दूध जमींदार ले जाता है।
समाजवाद
आपके पास दो गायें हैं तो एक आप अपने पड़ोसी को दे दें।
फासिज्म
आपके पास दो गाएं हैं । सरकार दोनों गायें ले लेगी । आपको इस नौकरी पर लगा देगी कि आप उनकी देखभाल करें और फिर वह आपको उसका दूध बेचेगी।
कम्युनिज्म
आपके पास दो गायें हैं। सरकार दोनों को ले लेगी और आपको कुछ दूध देगी।
नौकरशाही
आपके पास दो गायें हैं । राज्य दोनों गायों को ले लेगा। एक को मार डालेगा। दूसरी...
पिछले दिनों पहले योजना आयोग के अध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने घोषणा की कि चाय को राष्ट्रीय पेय घोषित किया जाएगा।सुनकर बहुत अजीब सा लगा ।इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि चाय बहुत कमाल का पेय है। जिसके बारे में निसंकोच कहा जा सकता है – कम्बख्त छूटती नहीं मुंह से लगी हुई।लेकिन मन में सवाल उठा कि हम तो दशकों से चाय पी रहे है वह भी बिना नागा। जबतक अखबार की गर्मागर्मा खबरों के साथ चाय का नोश न फरमाया जाए तबतक तो लगता ही नहीं कि दिन शुरू हुआ है।इसके बाद सुस्ती भगाने,नींद उड़ाने या ताजगी लाने के बहाने चाय के दौर चलते ही रहते हैं।मैं कोई अनोखा जीव नहीं हूं देश के करोड़ों...
बोल के लब आजाद हैं तेरे
बोल जबां अब एक तेरी है
तेरा सुतवा जिस्म है तेरा
बोल के जां अब तक तेरी है
देख के:आहंगर की दुकां में
तुंद हैं शोले,सुर्ख हैं आहन
खुलने लगे हैं कुफलों के दहाने
फैला हर जंजीर का दामन
बोल,ये:थोड़ा बहुत वक्त बहुत है
जिस्म- ओ-जबां की मौत से पहले
बोल,के सच जिंदा है अबतक
बोल,जो कुछ कहना है कह ले
- फैज अहमद फैज
- किसी देश की ज्यादा से ज्यादा टैक्स लगाकर अमीर होने की कोशिश वैसी है कोई आदमी बाल्टी के अंदर खड़ा हो जाए और उसका हैंडल पकड़कर अपने को ऊपर उठाने की कोशिश करे
- इस दुनिया में सबसे कठिन चीज है आयकर को समझना –अल्बर्ट आंइस्टीन
- आयकर रिटर्न पढ़कर पता चलता है कि हमारे देश में प्राचीनकाल से किस्से गढ़ने की परंपरा रही है और वह आज भी घून में हिलोरे भर रही है।
- आयकर ने इस देश में जितने झूठ बोलनेवाले पैदा किए उतने तो राजनीति ने भी नहीं किए।
- ऐसा क्यों होता है कि करों में थोड़ी सी बढ़ोतरी करने पर दो सौ रूपये का भोझ पड़ता है और करों में भारी कटौती से...
पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकार के खिलाफ सड़क से संसद तक संघर्ष करने के दौरान अदम्य साहस व जुझारूपन प्रदर्शित करने के कारण बंगाल की शेरनी जैसे उपनाम से प्रसिद्ध ममता बनर्जी ने अपने राजनैतिक कैरियर में बहुत सारे मील के पत्थर स्थापित किए हैं। अपने समय में सबसे युवा सांसद होने का खिताब प्राप्त करने वाली ममता के बागी तेवर तो खुर्राट सोमनाथ चटर्जी को चुनाव में धूल चटाने के बाद से ही नजर आने लगे थे। केंद्रीय रेलमंत्री के पद पर भी दो कार्यकाल पूरा करने वाली ममता के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल की जनता को बेहतर भविष्य की आस बंधी और उन्होंने मां-माटी-मानुष के नारे को हाथो-हाथ लिया।...
हम पंछी उन्मुक्त गगन के
पिंजरबद्ध न गा पाऍंगे
कनक-तीलियों से टकराकर
पुलकित पंख टूट जाऍंगे ।
हम बहता जल पीनेवाले
मर जाऍंगे भूखे-प्यासे
कहीं भली है कटुक निबोरी
कनक-कटोरी की मैदा से ।
स्वर्ण-श्रृंखला के बंधन में
अपनी गति, उड़ान सब भूले
बस सपनों में देख रहे हैं
तरू की फुनगी पर के झूले ।
ऐसे थे अरमान कि उड़ते
नील गगन की सीमा पाने
लाल किरण-सी चोंच खोल
चुगते तारक-अनार के दाने ।
होती सीमाहीन क्षितिज से
इन पंखों की होड़ा-होड़ी
या तो क्षितिज मिलन बन जाता
...
- जो सरकार जितनी बड़ी होती है कि जो आप जो चाहें दे सकती है वह इतनी ताकतवर भी होती है कि वो वह सब ले सकती है जो आपके पास है।
- सरकार को सत्ता और अधिकार देना ठीक वैसा ही है जैसे किसी किशोर को शराब की बोतल और कार की चाबियां देना है।
- मैं लतीफे नहीं बनाता बस सरकार को काम करते देखता हूं और हकीकत बयान करता हूं।
- किसी भी समस्या का सरकारी समाधान उतना ही उतना ही बुरा होता है जितनी की समस्या।
- हास्य लेखक बनने के लिए ज्यादा मेहनत की जरूरत नहीं होती क्योंकि पूरी सरकार आपकी जो मदद कर रही होती है।
- जब विधायिका का सत्र चल रहा होता...
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