अजय कुमार जैन का ब्लॉग

बीमारू राज्यों का अच्छा प्रदर्शन

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उत्तर भारत के हिंदीभाषी राज्यों को आमतौर पर पिछड़ा मान लिया जाता है। सामाजिक विकास के तमाम पैमानों पर ये राज्य पिछड़े हुए हैं, चाहे वह शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो या स्त्री-पुरुष बराबरी हो। जनसंख्या नियंत्रण के उद्देश्यों को पूरा करने में ये राज्य सबसे बड़ी बाधा हैं, दक्षिणी राज्यों ने औसतन 2.1 जन्म प्रति दंपति का लक्ष्य पा लिया है, यानी उनकी जनसंख्या लगभग स्थिर हो गई है। इसलिए ज

अल्पसंख्यकों पर दांव

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कांग्रेस ने इस बार गजब का दांव मारा है| यह दांव वैसा ही है, जैसा कि 1971 में इंदिराजी ने मारा था| गरीबी हटाओ!

जल प्रदूषण की मार

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पर्यावरण संबंधी तमाम अध्ययन देश में जल प्रदूषण के दिनोंदिन भयावह होते जाने के बारे में चेताते रहते हैं। अब सीएजी यानी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने भी इस बारे में आगाह किया है। पर्यावरणविदों की चेतावनियों की बराबर अनदेखी की गई है। इसलिए स्वाभाविक ही सवाल उठता है कि क्या सीएजी की इस रिपोर्ट को हमारी सरकारें गंभीरता से लेंगी!

लोकतंत्र पर कैसी लगाम

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महातिर मोहम्मद अकेले नहीं हैं, जिन्हें लगता है कि भारत में ‘जरूरत से ज्यादा’ लोकतंत्र है। मलयेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री के इस बयान से आवाज मिलाते हुए केंद्रीय मंत्री फारूक अब्दुल्ला ने यह जरूरत बता दी है कि अब देश में अनियंत्रित लोकतंत्र को अपनाने का समय आ गया है।

अभिव्यक्ति की आजादी

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केंद्रीय दूरसंचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल ने गूगल और फेसबुक जैसी इंटरनेट कंपनियों से कहा है कि वे अपनी साइट्स पर आपत्तिजनक सामग्री को जांचने और हटाने की व्यवस्था करें। कपिल सिब्बल ने संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में और कुछ धार्मिक नजरिये से आपत्तिजनक सामग्री के संदर्भ में यह बात कही। सरकार यह भी चाहती है कि आपत्तिजनक सामग्री

भ्रष्टाचार सूचकांक में लुढ़का भारत

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भारत में भ्रष्टाचार का बढ़ना न केवल एक बड़ी चिंता की बात, बल्कि एक ऎसा पक्ष है, जिस पर ज्यादातर भारतीयों को शर्म का अहसास हो रहा है। ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल की ताजा रिपोर्ट बता रही है कि भारत में पारदर्शिता और कम हो गई है। भारत वर्ष 2007 में 72वें स्थान पर था, लेकिन अब घटती पारदर्शिता की वजह से 95वें स्थान पर आ गया है।

संप्रग सरकार की लाचारी

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यदि खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को मंजूरी देने के फैसले के जरिये सरकार उस बनती धारणा को समाप्त करना चाह रही थी कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की दूसरे कार्यकाल में नीतिगत स्तर पर लकवाग्रस्त स्थिति है, तो सरकार मकसद में बुरी तरह नाकाम हुई। इसके बजाय संप्रग के नाराज सहयोगी दल आरोप लगा रहे हैं कि उनसे परामर्श नहीं किया गया, सत्तारूढ़ कांग्रेस में भी विरोधाभास के स्वर सुनाई पड़ रहे हैं और एकजुट विपक्ष संसद के भीतर और बाहर दोनों मोर्चों पर सरकार को कमजोर करने पर आमादा है।

कलाम की सुनें

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पूर्व राष्ट्रपति डॉ.

जोखिम भरा सफ़र

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कई सालों से भारतीय रेलवे को विश्व मानकों के अनुरूप ढालने का दम भरा जा रहा है। सुरक्षा संबंधी दावे भी बढ़-चढ़ कर किए जाते हैं। मगर हकीकत यह है कि आए दिन देश के किसी न किसी हिस्से में गाड़ियों की आपसी टक्कर, उनके पटरी से उतरने, आग लगने आदि घटनाएं हो जाती हैं। पिछले साढ़े सात महीनों में करीब इक्यासी रेल दुर्घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें तीन सौ से ऊपर लोगों को जान गंवानी पड़ी है। हा

सार्थक पहल की जरूरत

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चुनाव सुधारों पर छिड़ी राष्ट्रव्यापी बहस के बीच मुख्य निर्वाचन आयुक्त एसवाई कुरैशी ने लोकसभा व विधानसभाओं का कार्यकाल चार साल करने का सुझाव देकर नया सुर छेड़ दिया है। कुरैशी ने पांच साल के कार्यकाल को घटाकर चार साल करने के पीछे कोई व्यावहारिक तर्क पेश नहीं किया है।

देश में लंबे समय से चुनाव सुधारों को लेकर बहस चल रही है। मतदाताओं को 'राइट टु रिजेक्ट' या 'राइट टु रिकॉल' का अधिकार देने का मामला हो या अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने का मामला हो या निर्धारित सीमा से अधिक धन खर्च करने वाले प्रत्याशियों को रोकने का मामला, बात बहस से आगे बढ़ ही नहीं पा रही। हर राजनीतिक दल साफ छवि के प्रत्याशियों को टिकट देने की बात तो करता है, लेकिन मौका जब टिकट बांटने का आता है, तो राजनीतिक दल साफ छवि की बजाय 'जिताऊ' उम्मीदवार पर दांव लगाने से नहीं चूकते।

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