भ्रष्टाचार को गिरफ्तार करो, उसके विरोधकर्ताओं को नहीं
64 वर्ष पूर्व कांग्रेस पार्टी ने स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया था जिसने अंग्रेजो के निर्दयी एवं दमनकारी शासन का पर्दाफाश किया. उसने हाल मे अपने साथ भी कुछ ऐसा ही किया. अन्ना हजारे के अनशन के दौरान कांग्रेस पार्टी ने जो-जो किया उस से उसने ये सिद्ध कर दिया है की वो खुद भी कितनी निर्दयी ,बेवकूफ एवं दमनकारी है. अन्ना हजारे को जेल में डालकर, उन्होंने ऐसे जन समर्थन की लहर पैदा कर दी है जिसने इस आंदोलन में हुयी पिछली गलतियों को छिपा दिया है.
ऐसा ही कुछ तब हुआ था जब ब्रिटिश हुकूमत ने महात्मा गाँधी को और इंदिरा गांधी ने जयप्रकाश नारायण एवं उनके सहयोगियो को 1970 के समय जेल में डाला था. हालंकि हजारे की तुलना महात्मा गाँधी एवं जयप्रकाश नारायण से नहीं की जा सकती है. पर ये सरकार के द्वारा उठाये गाये अनुचित कदमो को सही नहीं ठहरा सकता है जो भ्रष्टाचार को खत्म करने के बजाय उसके खिलाफ उठ रहे आंदोलन को खत्म करना चाह रही है. इस वजह से अन्ना खामियों के बावजूद भी नायक के रूप में उभरे हैं वहीँ दूसरी ओर सरकार और ज्यादा भ्रष्ट नजर आ रही है. हालाँकि अन्ना हजारे और प्रशांत भूषण के द्वारा प्रस्तुत किये गए लोकपाल बिल के संस्करण में मेरे भी कुछ मतभेद हैं, पर मैं इन्हें बहादुर और आदर्शवादी योद्धा मानता हूँ जो भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ कर रहे हैं. वो भी तब जब सरकार इस बारे में कुछ नहीं कर रही है. इनके भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने लाखों भारतीयों के गुस्से को एक मंच दिया है और अनशन पर बैठ कर सरकार को शर्मिंदा भी कर दिया है.
हजारे को कुचलने की कोशिश एवं रैलियों को रोकने के लिए धारा 144 के अनुचित प्रयोग ने निश्चित तौर पे 1975-77 के आपातकाल की यादें ताज़ा कर दी हैं. कांग्रेस इन सब के पीछे “विदेशी हाथ” होने की बात कर रही है. ये सुन के हँसी ही आती है जब बीजेपी कहती है की ये बाहरी हाथ इटली से ताल्लुक रखता है.
कांग्रेस प्रवक्ताओं का कहना की अन्ना समर्थक ऐसे किसी हक की मांग नहीं कर सकते हैं जिसके तहत उन्हें किसी भी जगह और किसी भी समय धरना या प्रदर्शन करने की छूट दे दी जाय. ये अच्छा तरीका है. परन्तु क्या 1970 की दशक के जयप्रकाश आंदोलन के समय कोई विशेष समय या स्थान निर्धारित किया गया था? या 1958 में केरल सरकार के खिलाफ कांग्रेस की आंदोलन में? या फिर 1950 में आंध्र प्रदेश, पंजाब एवं महाराष्ट्र के पृथक राज्य की मांग से जुड़े जन मोर्चो के दौरान ऐसा कुछ हुआ था? क्या कांग्रेस उन सभी लोगो को दोषी करार देगी जिन्होंने बिना समय और स्थान बताये मिस्र, लीब्या और ट्यूनीशिया के जनमोर्चो में भाग लिया था. सच तो ये है की एक प्रबल आंदोलन हज़ारों आंदोलनकारियों की जान भी ले सकता है. कांग्रेस चाहती है की अन्ना अपने समर्थकों की संख्या पे लगाम लगाये और इसे 25 हज़ार पे सीमित कर दे, जैसे वो किसी दावत के लिए लोगों को आमंत्रण दे रहे हों. कांग्रेस का कहना है की देश की आंतरिक सुरक्षा एवं एकता पर इन आंदोलनों का गलत असर पड़ रहा है, पर असल में इस से सिर्फ कुछ ठगों की सुरक्षा ही आहत होती है.
कपिल सिब्बल कांग्रेस पार्टी के उन प्रवक्ताओं में से हैं जो ये कह रहे हैं की अन्ना हजारे के लोकपाल बिल का संस्करण असंवैधानिक हैं. पर लोकतंत्र में ये हक हर किसी को होता है की वो अपनी बात कह सके और और कानून को सही करने के लिए उसमे परिवर्तन की मांग कर सके. सिर्फ विधायिका ही ऐसे बदलाव लागू कर सकती है, पर इस से हमारे नए कानून बनाए की मांग पे कोई फर्क नहीं पड़ता.
कांग्रेस के लिए ये कहना बेहद आसान है की अन्ना अनशन करके उन्हें धमकी दे रहे हैं. पर क्या वो महात्मा गाँधी के ऊपर भी यही आरोप लगाएंगे जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अनशन किया था? क्या वो पृथक राज्य की मांग करने वाले आंध्र प्रदेश की नायक पोट्टी सृमालू को भी दोषी बताएँगे जिनकी अनशन के दौरान ही मौत हों गयी थी. परिभाषिक तौर पे “धमकी” उस धनराशी को बोलते है जो आपके किसी रहस्य को न उजागर करने के बदले में मांगी जाती है. निश्चित तौर पे कांग्रेस के हज़ारो गंदे रहस्य है पर अन्ना हजारे उन्हें दबाने के लिए किसी धनराशी की मांग नही कर रहे हैं. बल्कि वो मांग कर रहे हैं कि उन गंदे रहस्यों को दोषी ठहराया जाये और उनको सलाखों के पीछे पहुँचाया जाए.
मैं प्रधानमत्री द्वारा स्वतंत्रता दिवस पे दिए गए भाषण से निराश हूँ. उन्होंने कहा “हमारे देश में कुछ लोग ऐसे हैं जो देश की प्रगति में बाधा बनना चाहते हैं ताकि देश की प्रगति पे विराम लग जाए.” कृपया मेरा नाम भी ऐसे लोगो की सूची में जोड़ लीजिए. मै और मेरे जैसे हज़ारों लोगो की “तरक्की” के नाम पे जो कुछ हों रहा है, हम उस से हैरान हैं और निश्चित तौर पे इसे रोकना चाहते हैं. ये कहना कि भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाये गए आंदोलन से हमारी प्रगति रुक जायेगी, बेबुनियाद है.
प्रधानमंत्री के ये कहना एक भद्दा मजाक है की “सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम उठा रही है.” 2 जी घोटाले में भी गिरफ्तारियां मुख्य-न्यायलय के दखल के बाद ही हुई थी. सोनिया गाँधी भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई ठोस कदम उठाने नहीं देंगी क्योंकि इस से स्वयं उन्ही की पार्टी का भांडा फूट जायेगा. दूसरी पार्टियों का भी यही हाल है और वो भी इसी कारण से इस आंदोलन के प्रति गंभीर नहीं हैं.
मनमोहन सिंह का ईमानदार होना ही काफी नहीं है. उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ना होगा. राजनैतिक रूप से भी यही उचित होगा की वो नौकरशाहों के खिलाफ भ्रष्टाचार विरोधी युद्ध की शुरुआत कर दें जो देश के नागरिकों का खून जोंक की तरह चूस रहे हैं. ये कार्य राज्य पुलिस का है, राष्टीय पुलिस बल का नहीं. परन्तु मनमोहन सिंह स्वयं दिल्ली से शुरुआत कर सकते हैं. वो उन नौकरशाहों के खिलाफ मुहिम की शुरुआत कर सकते हैं जो पूर्णतयाः भ्रष्टाचार में लिप्त हैं.
ये नौकरशाह ऐसी कोशिशों को हड़ताल या आन्दोलन के ज़रिये रोकना चाहेंगे. पर अगर कांग्रेस ऐसे भ्रष्ट लोगों के खिलाफ भी खड़ी नहीं हो सकती तो अगले ही चुनाव में उसे सत्ता से बाहर कर देना चाहिए.
- स्वामीनाथन अय्यर![]()
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