अप्रैल 2012

बोल

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बोल के लब आजाद हैं तेरे
बोल जबां अब एक तेरी है
तेरा सुतवा जिस्म है तेरा
बोल के जां अब तक तेरी है
देख के:आहंगर की दुकां में
तुंद हैं शोले,सुर्ख हैं आहन
खुलने लगे हैं कुफलों के दहाने
फैला हर जंजीर का दामन
बोल,ये:थोड़ा बहुत वक्त बहुत है
जिस्म- ओ-जबां की मौत से पहले
बोल,के सच जिंदा है अबतक

कुछ व्यंग्यविचार

  • किसी देश की ज्यादा से ज्यादा टैक्स लगाकर अमीर होने की कोशिश वैसी है कोई आदमी बाल्टी के अंदर खड़ा हो जाए और उसका हैंडल पकड़कर अपने को ऊपर उठाने की कोशिश करे
  • इस दुनिया में सबसे कठिन चीज है आयकर को समझना –अल्बर्ट आंइस्टीन
  • आयकर रिटर्न पढ़कर पता चलता है कि हमारे देश में प्राचीनकाल से किस्से गढ़ने की परंपरा रही है और वह आज भी घून में हिलोरे भर रही है।

पश्चिम बंगाल में ये क्या हौ रहा है...

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पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकार के खिलाफ सड़क से संसद तक संघर्ष करने के दौरान अदम्य साहस व जुझारूपन प्रदर्शित करने के कारण बंगाल की शेरनी जैसे उपनाम से प्रसिद्ध ममता बनर्जी ने अपने राजनैतिक कैरियर में बहुत सारे मील के पत्थर स्थापित किए हैं। अपने समय में सबसे युवा सांसद होने का खिताब प्राप्त करने वाली ममता के बागी तेवर तो खुर्राट सोमनाथ चटर्जी को चुनाव में धूल चटाने के बाद से ह

हम पंछी उन्मुक्त गगन के

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हम पंछी उन्मुक्त गगन के
पिंजरबद्ध न गा पाऍंगे
कनक-तीलियों से टकराकर
पुलकित पंख टूट जाऍंगे ।
हम बहता जल पीनेवाले
मर जाऍंगे भूखे-प्यासे
कहीं भली है कटुक निबोरी
कनक-कटोरी की मैदा से ।
स्वर्ण-श्रृंखला के बंधन में
अपनी गति, उड़ान सब भूले
बस सपनों में देख रहे हैं
तरू की फुनगी पर के झूले ।

सरकार – कुछ व्यंग्य़विचार

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  • जो सरकार जितनी  बड़ी होती है कि जो आप जो चाहें दे सकती है वह इतनी ताकतवर भी होती है कि वो वह सब ले सकती है जो आपके पास है।
  • सरकार को सत्ता और अधिकार देना ठीक वैसा ही है जैसे किसी किशोर को शराब की बोतल और कार की चाबियां देना है।
  • मैं लतीफे नहीं बनाता बस सरकार को काम करते देखता  हूं और हकीकत बयान करता हूं।

हंसने की आजादी है

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बात तब की है जब रशिया सोवियत संघ हुआ करता था और वहां कम्युनिस्टों का राज होता था।
मास्को के बाजार में दो परिचित मिले एक ने दूसरे से पूछा – क्या हालचाल है ?
दूसरे ने जवाब दिया –  बहुत बढ़िया ।

जहां चित्त भय से शून्य हो

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नोबेल पुरस्कार विजेता महाकवि रवींद्रनाथ ठाकुर की एक मुक्त विश्व की कल्पना करनेवाली  बहुचर्चित कविता  'चित्ति जेथार भयशून्या' का बहुत अच्छा हिन्दी अनुवाद पिछले दिनों एक ब्लाग पर पढ़ने को मिला उसे हम यहां पेश कर रहे हैं -