अनाज की दृष्टि से सोचें तो देश की कृषि का भविष्य है महाअकाल –शरद जोशी

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मराठी के लोकप्रिय अखबार लोकसत्ता के आयडिया एक्सचेंज में पिछले दिनों किसान नेता और उदारवादी चिंतक शरद जोशी को बुलाया गया था । इस कार्यक्रम में अखबार के संपादकीय विभाग के लोग मेहमान के साथ विभिन्न मुद्दों पर बातचीत करते हैं। इस कार्यक्रम में शरद जोशी देश की कृषि की समस्याओं और उसके समाधान के बारे में विस्तार और बेबाकी के साथ अपने विचार रखे । हम लोकसत्ता से साभार इस बातचीत के अंश दो किश्तों में प्रकाशित कर रहे हैं। मराठी में हुई इस बातचीत का अनुवाद किया है – सतीश पेडणेकर ने। यहां प्रस्तुत है उसकी दूसरी किस्त -

अभिजित बेल्हेकर – आजादी को साठ साल हो गए तो भी हम कृषि माल को सही दाम नहीं दिला सके। इसके पिछले का अर्थशास्त्र क्या है। आज तो यह सवाल खड़ा हो गया है कि खेती क्यों की जाएं।

जोशी – उद्योगो को संरक्षण देना यही प्राधमिकता है। इससे दो महत्वपूर्ण बातें होती हैं। कच्चा माल सस्ता रखा जाए और उसके साथ निर्मित उत्पाद की कीमतें भी कम रखी जाएं। ऐसा करने पर ही उद्योग टिक सकते आज इस सवाल का धीरे –धीरे जवाब मिलने लगा है । आज ऐसी स्थिति हैं कि खेती के लिए तेल नहीं है,बिजली नहीं है ,मशीनरी नहीं है। यदि यह स्थिति बनी रही तो सारे हिन्दुस्तान में जो नतीजा निकलनेवाला है वह है महाअकाल । ऐसा मुझे लगता है।चालीस प्रतिशत किसान खेती करना नहीं चाहता। वह खेती की जमीन लेकर रख लेता है उसपर खेती की जाए या नहीं यह अडिशनल फैक्टर है।

संगोराम – क्या हम महाअकाल की ओर बढ़ रहे हैं ?

कुबेर – एक तरफ कृषि उत्पादन में भारी वृद्धि हुई है। और दूसरी तरफ आप कह रहे हैं कि हम महाअकाल की तरफ बढ़ रहे हैं।

जोशी – पहली बात कृषि को लेकर हमारे पास जो आंकड़े है उनको लेकर मेरे मन में भारी संशय है। इन सारे आंकड़ों को फिर से जांचने की जरूरत है। उन आंकड़ों को ठीक करने की मशीनरी हमारे पास नहीं है।। इस कारण अकाल पैदा नहीं हो रहा है। लेकिन आप मुझे बताइए किसान खेती कैसे करे । यदि उसके पास काम करने के लिए आदमी न हों ,पानी न हो,बिजली नही मिलती हो, खाद नहीं मिलती हो तो वह खेती कैसे करे। आपने उसके लिए खेती करना असंभव बना दिया है।

मिलिंद ढमढरे – किसान कर्ज लेता है लेकिन जिस काम के लिए लेता है उसमें निवेश नहीं करता है । इस बारे में ---

जोशी – उनकी संख्या बहुत कम है। मैंने जब शेतकरी संगठना की स्तापना की तब अर्थशास्त्र की सारी किताबें वही बाते कहती थी जो आप कह रहे हैं। उससे ऐसी धारणा बनती है किसान अज्ञानी है,निरक्षर है।शादी व्याह पर ज्यादा खर्च करता है।व्यसनों का शिकार है इसलिए वह कर्झे में है। मुझे लगता है कि किसान को कर्ज में रखना और खेती को गरीब रखना  केंद्र सरकार की सुनियोजित और सचेतन  नीति है। 

संगोराम -  आपने जब काम शुरू किया और उसके बाद के 35-40 वर्षों के बाद आपको स्थिति में कोई गुणत्मक फर्क नजर आता है।पिछले पांच वर्षों में किसानों की आत्महत्याएं बड़े पैमाने पर बढ़ी हैं।

जोशी – गुणत्मक फर्क यह नजर आता है कि शेतकरी संगठना की भाषा सभी नेता उपयोग करने लगे हैं। सभी ने शेतकरी संगठना की सोच को स्वीकार किया है। लेकिन जिनके हाथों में सत्ता है  उनहोंने उस पर अमल करते हुए उस पर गलत ढंग से अमल किया। जैसे कर्झमुक्ति पर अमल किया उसी तरह से।कर्ज के बारे में देखें तो उसमें ज्यादातर  किसान कपास पट्टी के हैं। कपास की हालत यह है कि जब विश्व बाजार में 210 रूपये का भाव था तब काटन कारपोरेशन आफ इंडिया 100 रूपये का भाव दे रही थी  और महाराष्ट्र की एकाधिकार कपास योजना के तहत 60 रूपये का भाव दिया जा रहा था। जब आप 210 और 60 का फर्क देखेंगे तब आपको समझ में आ जाएगा कि कपास उत्पादक किसान क्यों आत्महत्या करता है।गन्ने की तरह कपास भी व्यावसायिक फसल है। एक महत्वपूर्ण मुद्दा मैं  पहली बार पेश कर रहा हूं। हमारे पश्चिम महाराष््ट्र में गन्ना उगानेवालों को गुड़ बनाने का आदत थी  उसी तरह यदि विदर्भ के किसानों को  छोटे पैमाने पर सूत कातने और हाथकरघा लगाने की ट्रैनिंग दी जाती तो कपास एकाधिकार योजना इतनी बुरी तरह से नाकाम नहीं होती।

कुबेर – हम एक अजीब स्थिति देख रहे हैं।  आमतौर पर किसी मंत्रालय का मंत्री इस बात कि चिंता करता है कि उसके मंत्रालय का विकास कैसे होगा,उसकी प्रगति कैसे होगी। हमारे देश का कृषिमंत्री कहता है कि आप खेती छोड़ों। क्या यह एक विरोधाभास नहीं है।

जोशी – शरद पवार ने खेती छोडने की सलाह दी या अप्रत्यक्ष तौरपर किसानों को गैर ऋषि व्यवसाय अपनाने को कहा । उसका अर्थ वही है।किसानों के लिए एक एक्जिट पालिसी की जरूरत है। जमिनों की कीमतें बढ़ रही है उसका लाभ उठाना चाहिए। किसानों ने इतने वर्षों तक जमिन का नुक्सान उठाया अब फायदा लेकर मुक्त होने की संभावना पैदा हुई है।इसलिए खेती के लिए एक्झिट पालिसी की जरूरत है।

कुबेर -भूमि अधिग्रहण के नए बिल के बारे में आपका क्या नजरिया है ?

जोशी – जो नागरिकों के अधिकार हैं वे किसानों को हासिल हैं कि नहीं? अगर ऐसा है तो किसान को जबतक खेती  करनी है तबतक उसे खेती से पलायन करना न पड़े। यदि वह चाहे तो वह खेती कर सके। तबतक कोई भी सरकार उसे छुए तक नहीं। यदि वह खेती को बेचना चाहे तो बेच सके। अंबेडकर के संविधान द्वारा दिया गया यह मौलिक अधिकार बना रहना चाहिए।

कुबेर – क्या आप भूमि अधिग्रहण कानून के खिलाफ हैं ?

जोशी – उसके वर्तमान स्वरूप के खिलाफ हूं। हम पहले संशोधन के खिलाफ हैं।

संगोराम – एक तरफ आप कहते हैं कि किसानों के लिए एक्जिट पालिसी होनी चाहिए। दूसरी तरफ आप कहते हैं कि शरद पवार किसानों से कह रहे हैं कि खेती मत करो।तो अगले पचास वर्षों में अनाज की दृष्टि से कृषि का भविष्य क्या होगा

जोशी – एक शब्द में कहूं तो महाअकाल 

संगोराम – इससे बाहर कैसे निकला जा सकता है ?  रास्ता क्या है ?

जोशी - यह सहज संभव है। कृषि उत्पादों को सही दाम देना शुरू किया जाए। यानी बाजार में हस्तक्षेप को कम किया गया तो जादू की छड़ी घूमाने के जैसा चमत्कार नजर आएगा।

गिरिश कुबेर – शेतकरी संगठना की भविष्य की दिशा क्या होगी  ? शेतकरी संगठना नाम रहे या न रहे लेकिन किसानों की समस्याएं और राजनीति के संदर्भ में उनकी सोच और भविष्य की दिशा क्या होगी ?

जोशी - इस बारे में मैं कहना चाहूंगा कि जैसा सचिन ने कहा है कि मैंने जो रेकार्ड बनाए है उन्हें कोई भारतीय ही तोड़े वैसे ही मैं इच्छा प्रगट करूंगा कि महाराष्ट्र में एक और सुपुत्र पैदा हो। जब मैं बहुत आत्मविश्वासयुक्त बातें करता था तब भी इस तरफ संकेत करता ही था।लेकिन कार्यकर्ताओं के आग्रह के कारण चलता रहा लेकिन दिनोंदिन यह मुश्किल होता जा रहा है। उसका मेरे स्वास्थ्य पर प्रभाव पडने लगा। अब मैं लगभग अपंगावस्था में पहुंच गया हूं।

कुबेर - आजकल क्वांटम फिजिक्स आपका पसंदीदा विषय बन गया है उसका क्या कारण है ?

जोशी -आजकल में क्वांटम फिजिक्स के बारे में पढ़ रहा हूं लेकिन मेरी दिलचस्पी आध्यात्म में है। जेनेटीक इंजीनियरिंग और जीन माडीफिकेशन के सिद्धातों के बारे में पढंते हुए, इन सभी क्षेत्रों में जीवन का क्या महत्व है इस पर चिंतन करते हुए मैं अध्यात्म की तरफ गया। मेरी इच्छा है कि जैसे मैं कृषि के क्षेत्र में नए चिंतन को पेश कर सका उसी तरह अध्यात्म के क्षेत्र में भी कर पाऊं।